*Guruvaani - 966*
*सलोक मः ५ ॥ फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥ जो नर पीरि निवाजिआ तिन्हा अंच न लाग ॥१॥*
भूमि = धरती। रंगावली = रंग+आवली। आवली = कतार, सिलसिला। रंगा = आनंद। रंगावली = सुंदर। मंझि = (इस) में। विसूला = विष भरा, विहुला।1।
सुहावड़ी = सुहावनी, सुख भरी। संगि = (उम्र के) साथ। सुवंन = सुंदर रंग। सुवंनड़ी = सुंदर रंग वाली। देह = शरीर। पाईअन्हि = पाए जाते हैं, मिलते हैं। नेह = प्यार।
देहि = तू देवे। बुझाइहि = तू मिटा देवे। जिसु अगनि = जिस (मनुष्य) की तृष्णा आग। रंगु = प्यार। सिउ = साथ। कटि = काट के। नामि = नाम से। कटिओनु = उस (प्रभु) ने काट दिया। अंध कूप = अंधा कूँआ, वह कूआँ जिसमें अज्ञानता का अंधेरा ही अंधेरा है। काढिअनु = उस (प्रभु) ने निकाल लिए। लड़ु = पल्ला। बखसि = बख्श के, मेहर करके। मिलाइअनु = उसने मिला लिए। गलि = गले से।
मुहबति = प्यार। रंगि = रंग में। चलुलि = गाढ़े लाल रंग में। चलूल = गाढ़ा लाल। पाईअहि = मिलते हैं। कीम = कीमत। न मूलि = बिल्कुल नहीं।
अंदरु = अंदरूनी, हृदय। सचि = सच में। नाइ = नाय, नाम में। डिठोमि = मैंने देखा। रविआ = व्यापक। हभ थाइ = हरेक जगह में। वणि = वन में। त्रिणि = तृण में। त्रिभवणि = त्रिभवन में। रोमि = रोम रोम में।
कीतो रचनु = जगत रचना रची। रतिआ = (रचना में) मिला हुआ है। इकु = निराकार रूप स्वयं ही स्वयं। बहु भतिआ = सरगुण रूप में अनेक रंगों रूपों वाला। मंझि = में। जाणहि = तू जानता है। दूरि = रची हुई रचना से अलग। तेरी थटीऐ = तेरी कुदरति की। अगणतु = जिसके गुण गिने ना जा सकें।
राइ बलवंडि = राय बलवंड ने। तथा = और। सतै = सते ने। डूमि = डूम ने,मिरासी ने, रबाबी ने। सतै डूमि = सते रबाबी ने। आखी = उचारण की, सुनाई।
नाउ = नाम, मशहूरी, प्रसिद्धि, इज्जत, महिमा, बड़ाई। बोलु = वचन, बात। जोखीवदै = जोखने के लिए, तोले जाने के लिए, (उस प्रसिद्धि को) मापने के लिए। किउ होवै = कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता। दे गुना सति = सति आदि दैवी गुण। पारंगति = पार लंघा सकने वाली आत्मिक अवस्था। दानु = बख्शिश। पड़ीवदै = प्राप्त करने के लिए। नानकि = नानक ने। कोटु = किला। सताणी = ताण वाली, बल वाली। नीव = नींव। दै = दे के।
धरिओनु = धरा उनि (गुरु नानक ने)। लहणे धरिओनु छतु सिरि = लहणे सिरि छतु धरिओनु, लहणे के सिर पर उन्होंने (गुरु नानक देव जी ने) छत्र रखा। करि सिफती = तारीफ करके, सराहना करके। अंम्रितु पीवदै = नाम अमृत पीते (लहणे जी के सिर पर)। मति गुर आतम देव दी = आतमदेव गुरु की मति के द्वारा। आतमदेव = अकाल पुरख। खड़गि = खड़ग से। जोरि = जोर से। पराकुइ = पराक्रम द्वारा, ताकत से।
जीअ = जीव दान, आत्म दान, आत्मिक जीवन। दै = दे कर। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल।
गुरि = गुरु ने, गुरु नानक देव जी ने। चेले रहिरासि = चेले (बाबा लहिणा जी) की रहरासि। रहरासि = अरदास, प्रणाम, नमस्कार। कीई = की। गुरि नानकि = गुरु नानक ने। सलामति थीवदै = सलामत होते ही, अपनी सलामती में ही, शारीरिक तौर पर जीवित होते ही। सहि = सहु ने, मालिक ने, गुरु ने। दितोसु = दिया उसको। जीवदै = जीवित रहते हुए ही।
लहणे दी = लहणे की (दोही), बाबा लहणा जी की महिमा की धूम। फेराईऐ = फिर गई, मच गई, पसर गई, बिखर गई। नानका दोही खटीऐ = (गुरु) नानक की दोहाई की इनायत से। दोही = शोभा की धूम। खटीऐ = कमाई के कारण, इनायत से। साइ = वही। जुगति = जीवन का ढंग। सहि = सहु (गुरु) ने। काइआ = काया, शरीर।
सु छत्रु निरंजनी = सुंदर रूहानी छत्र। मलि = मल के, संभाल के। गुर हटीऐ = गुरु (नानक) की दुकान में, गुरु नानक के घर में। करहि = (बाबा लहिणा जी) करते हैं। गुर फुरमाइआ = गुरु का फरमाया हुआ हुक्म। जोगु = ‘गुर फरमाइआ’ रूप जोग। सिल अलूणी चटीऐ = (गुरु का हुक्म कमाले-रूपी जोग, जो) अलूणी शिला चाटने के समान (बहुत ही मुश्किल काम) है।
```हे फरीद! (ये) धरती (तो) सुहावनी है (पर मनुष्य के मन के टोए-टिब्बों के कारण इस) में विषौला बाग़ (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिस जिस मनुष्य को सतिगुरु ने महान बना दिया है (ऊँचा किया है), उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लग सकता।1।```
```हे फरीद! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव, रोग-रहित) है जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है (‘विसूला बाग’ और ‘दुख-अगनी’ उनको नहीं छूते, पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं।2।```
``` हे प्रभु! जिस मनुष्य को तू (नाम की दाति) देता है वह (मानो) जप तप संजम दया और धर्म प्राप्त कर लेता है (पर) तेरा नाम वही स्मरण करता है जिसकी तृष्णा की अग्नि को तू खुद बुझाता है।```
```घट-घट की जानने वाला अगम्य (पहुँच से परे) व्यापक प्रभु जिस मनुष्य की ओर मेहर की एक निगाह करता है, वह सत्संग के आसरे रह के परमात्मा के साथ प्यार डाल लेता है। परमात्मा उसके सारे अवगुण काट के उसको आजाद करता है और अपने नाम के द्वारा (संसार-समुंदर से) पार लंघा देता है। उस (परमात्मा) ने उस मनुष्य का जनम-मरण का डर दूर कर दिया है, और उसको फिर जनम-मरण के चक्कर में नहीं डालता।```
```प्रभु ने जिनको अपना पल्ला पकड़ाया है, उनको (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएँ से (बाहर) निकाल लिया है। हे नानक! प्रभु ने उन पर मेहर करके अपने साथ मिला लिया है, अपने गले से लगा लिया है।21।```
``` जिस मनुष्य को रब का प्यार (प्राप्त हो जाता है), और वह (उसके प्यार के) गाढ़े रंग में रंगा जाता है, उस मनुष्य की कीमत नहीं आँकी जा सकती। पर, हे नानक! ऐसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं।1।```
``` जब मेरा अंदरला (भाव, मन) सच्चे नाम में भेदा गया, तब मैंने बाहर भी उस सदा स्थिर प्रभु को देख लिया। हे नानक! (अब मुझे ऐसे दिखता है कि) परमात्मा हरेक जगह मौजूद है, हरेक वन में, हरेक तीले में, सारे ही त्रिभवन, संसार में, रोम-रोम में।2।```
``` ये जगत-रचना प्रभु ने स्वयं ही रची है, और स्वयं ही इसमें मिला हुआ है। (कभी रचना को समेट के) एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है, कभी अनेक रंगों-रूपों वाला बन जाता है। प्रभु स्वयं ही सारे जीवों में मौजूद है, और निर्लिप भी स्वयं ही है।```
```हे प्रभु! तू खुद ही अपने आप को रचना से अलग जानता है, और खुद ही हर जगह हाजर-नाजर है। तू स्वयं ही छुपा हुआ है, और प्रकट भी स्वयं ही है। तेरी इस रचना का मूल्य किसी ने नहीं पाया। तू गंभीर है, तेरी थाह नहीं पड़ सकती, तू बेअंत है, तेरे गुण गिने नहीं जा सकते।```
```हे नानक! हर जगह एक प्रभु ही मौजूद है। हे प्रभु! एक तू ही तू है।22। सुधु।```
``` रामकली रागिनी की यह ‘वार’ जो राय बलवंड और सते डूम ने सुनाई थी।```
``` (किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे, उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव, मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरु के ऊँचे दर्जे को बयान कर सकूँ?) संसार-समुंदर से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं, वह गुण सतिगुरु जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव,) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरु) नानक देव जी ने सच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है।```
``` गुरु अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से, जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के, (बाबा) लहिणा जी के सिर पर, जो महिमा करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे, गुरु नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा।```
``` (अब) अपनी सलामती में ही गुरु नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका, और सतिगुरु जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरु गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया।1।```
``` (जब गुरु नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया, तब) गुरु नानक साहिब की महिमा की धूम की इनायत से, बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरु नानक साहिब वाली) ज्योति थी, जीवन का ढंग भी वही (गुरु नानक साहिब वाला) था, गुरु (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था।```
``` (बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रूहानी छत्र झूल रहा है। गुरु नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरु नानक देव जी से ‘नाम’ पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरु नानक साहिब के फरमाए हुए हुक्म को पाल रहे हैं: यह ‘हुक्म पालण’-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।```
*मः ५ ॥ फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥ विरले केई पाईअन्हि जिन्हा पिआरे नेह ॥२॥*
भूमि = धरती। रंगावली = रंग+आवली। आवली = कतार, सिलसिला। रंगा = आनंद। रंगावली = सुंदर। मंझि = (इस) में। विसूला = विष भरा, विहुला।1।
सुहावड़ी = सुहावनी, सुख भरी। संगि = (उम्र के) साथ। सुवंन = सुंदर रंग। सुवंनड़ी = सुंदर रंग वाली। देह = शरीर। पाईअन्हि = पाए जाते हैं, मिलते हैं। नेह = प्यार।
```हे फरीद! (ये) धरती (तो) सुहावनी है (पर मनुष्य के मन के टोए-टिब्बों के कारण इस) में विषौला बाग़ (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिस जिस मनुष्य को सतिगुरु ने महान बना दिया है (ऊँचा किया है), उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लग सकता।1।```
```हे फरीद! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव, रोग-रहित) है जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है (‘विसूला बाग’ और ‘दुख-अगनी’ उनको नहीं छूते, पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं।2।```
*पउड़ी ॥ जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥ जिसु बुझाइहि अगनि आपि सो नामु धिआए ॥ अंतरजामी अगम पुरखु इक द्रिसटि दिखाए ॥ साधसंगति कै आसरै प्रभ सिउ रंगु लाए ॥ अउगण कटि मुखु उजला हरि नामि तराए ॥ जनम मरण भउ कटिओनु फिरि जोनि न पाए ॥ अंध कूप ते काढिअनु लड़ु आपि फड़ाए ॥ नानक बखसि मिलाइअनु रखे गलि लाए ॥२१॥*
देहि = तू देवे। बुझाइहि = तू मिटा देवे। जिसु अगनि = जिस (मनुष्य) की तृष्णा आग। रंगु = प्यार। सिउ = साथ। कटि = काट के। नामि = नाम से। कटिओनु = उस (प्रभु) ने काट दिया। अंध कूप = अंधा कूँआ, वह कूआँ जिसमें अज्ञानता का अंधेरा ही अंधेरा है। काढिअनु = उस (प्रभु) ने निकाल लिए। लड़ु = पल्ला। बखसि = बख्श के, मेहर करके। मिलाइअनु = उसने मिला लिए। गलि = गले से।
```हे प्रभु! जिस मनुष्य को तू (नाम की दाति) देता है वह (मानो) जप तप संजम दया और धर्म प्राप्त कर लेता है (पर) तेरा नाम वही स्मरण करता है जिसकी तृष्णा की अग्नि को तू खुद बुझाता है।```
```घट-घट की जानने वाला अगम्य (पहुँच से परे) व्यापक प्रभु जिस मनुष्य की ओर मेहर की एक निगाह करता है, वह सत्संग के आसरे रह के परमात्मा के साथ प्यार डाल लेता है। परमात्मा उसके सारे अवगुण काट के उसको आजाद करता है और अपने नाम के द्वारा (संसार-समुंदर से) पार लंघा देता है। उस (परमात्मा) ने उस मनुष्य का जनम-मरण का डर दूर कर दिया है, और उसको फिर जनम-मरण के चक्कर में नहीं डालता।```
```प्रभु ने जिनको अपना पल्ला पकड़ाया है, उनको (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएँ से (बाहर) निकाल लिया है। हे नानक! प्रभु ने उन पर मेहर करके अपने साथ मिला लिया है, अपने गले से लगा लिया है।21।```
*सलोक मः ५ ॥ मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥ नानक विरले पाईअहि तिसु जन कीम न मूलि ॥१॥*
मुहबति = प्यार। रंगि = रंग में। चलुलि = गाढ़े लाल रंग में। चलूल = गाढ़ा लाल। पाईअहि = मिलते हैं। कीम = कीमत। न मूलि = बिल्कुल नहीं।
```जिस मनुष्य को रब का प्यार (प्राप्त हो जाता है), और वह (उसके प्यार के) गाढ़े रंग में रंगा जाता है, उस मनुष्य की कीमत नहीं आँकी जा सकती। पर, हे नानक! ऐसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं।1।```
*मः ५ ॥ अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥ नानक रविआ हभ थाइ वणि त्रिणि त्रिभवणि रोमि ॥२॥*
अंदरु = अंदरूनी, हृदय। सचि = सच में। नाइ = नाय, नाम में। डिठोमि = मैंने देखा। रविआ = व्यापक। हभ थाइ = हरेक जगह में। वणि = वन में। त्रिणि = तृण में। त्रिभवणि = त्रिभवन में। रोमि = रोम रोम में।
```जब मेरा अंदरला (भाव, मन) सच्चे नाम में भेदा गया, तब मैंने बाहर भी उस सदा स्थिर प्रभु को देख लिया। हे नानक! (अब मुझे ऐसे दिखता है कि) परमात्मा हरेक जगह मौजूद है, हरेक वन में, हरेक तीले में, सारे ही त्रिभवन, संसार में, रोम-रोम में।2।```
*पउड़ी ॥ आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥ आपे होइओ इकु आपे बहु भतिआ ॥ आपे सभना मंझि आपे बाहरा ॥ आपे जाणहि दूरि आपे ही जाहरा ॥ आपे होवहि गुपतु आपे परगटीऐ ॥ कीमति किसै न पाइ तेरी थटीऐ ॥ गहिर ग्मभीरु अथाहु अपारु अगणतु तूं ॥ नानक वरतै इकु इको इकु तूं ॥२२॥१॥२॥*
कीतो रचनु = जगत रचना रची। रतिआ = (रचना में) मिला हुआ है। इकु = निराकार रूप स्वयं ही स्वयं। बहु भतिआ = सरगुण रूप में अनेक रंगों रूपों वाला। मंझि = में। जाणहि = तू जानता है। दूरि = रची हुई रचना से अलग। तेरी थटीऐ = तेरी कुदरति की। अगणतु = जिसके गुण गिने ना जा सकें।
राइ बलवंडि = राय बलवंड ने। तथा = और। सतै = सते ने। डूमि = डूम ने,मिरासी ने, रबाबी ने। सतै डूमि = सते रबाबी ने। आखी = उचारण की, सुनाई।
नाउ = नाम, मशहूरी, प्रसिद्धि, इज्जत, महिमा, बड़ाई। बोलु = वचन, बात। जोखीवदै = जोखने के लिए, तोले जाने के लिए, (उस प्रसिद्धि को) मापने के लिए। किउ होवै = कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता। दे गुना सति = सति आदि दैवी गुण। पारंगति = पार लंघा सकने वाली आत्मिक अवस्था। दानु = बख्शिश। पड़ीवदै = प्राप्त करने के लिए। नानकि = नानक ने। कोटु = किला। सताणी = ताण वाली, बल वाली। नीव = नींव। दै = दे के।
धरिओनु = धरा उनि (गुरु नानक ने)। लहणे धरिओनु छतु सिरि = लहणे सिरि छतु धरिओनु, लहणे के सिर पर उन्होंने (गुरु नानक देव जी ने) छत्र रखा। करि सिफती = तारीफ करके, सराहना करके। अंम्रितु पीवदै = नाम अमृत पीते (लहणे जी के सिर पर)। मति गुर आतम देव दी = आतमदेव गुरु की मति के द्वारा। आतमदेव = अकाल पुरख। खड़गि = खड़ग से। जोरि = जोर से। पराकुइ = पराक्रम द्वारा, ताकत से।
जीअ = जीव दान, आत्म दान, आत्मिक जीवन। दै = दे कर। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल।
गुरि = गुरु ने, गुरु नानक देव जी ने। चेले रहिरासि = चेले (बाबा लहिणा जी) की रहरासि। रहरासि = अरदास, प्रणाम, नमस्कार। कीई = की। गुरि नानकि = गुरु नानक ने। सलामति थीवदै = सलामत होते ही, अपनी सलामती में ही, शारीरिक तौर पर जीवित होते ही। सहि = सहु ने, मालिक ने, गुरु ने। दितोसु = दिया उसको। जीवदै = जीवित रहते हुए ही।
लहणे दी = लहणे की (दोही), बाबा लहणा जी की महिमा की धूम। फेराईऐ = फिर गई, मच गई, पसर गई, बिखर गई। नानका दोही खटीऐ = (गुरु) नानक की दोहाई की इनायत से। दोही = शोभा की धूम। खटीऐ = कमाई के कारण, इनायत से। साइ = वही। जुगति = जीवन का ढंग। सहि = सहु (गुरु) ने। काइआ = काया, शरीर।
सु छत्रु निरंजनी = सुंदर रूहानी छत्र। मलि = मल के, संभाल के। गुर हटीऐ = गुरु (नानक) की दुकान में, गुरु नानक के घर में। करहि = (बाबा लहिणा जी) करते हैं। गुर फुरमाइआ = गुरु का फरमाया हुआ हुक्म। जोगु = ‘गुर फरमाइआ’ रूप जोग। सिल अलूणी चटीऐ = (गुरु का हुक्म कमाले-रूपी जोग, जो) अलूणी शिला चाटने के समान (बहुत ही मुश्किल काम) है।
```ये जगत-रचना प्रभु ने स्वयं ही रची है, और स्वयं ही इसमें मिला हुआ है। (कभी रचना को समेट के) एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है, कभी अनेक रंगों-रूपों वाला बन जाता है। प्रभु स्वयं ही सारे जीवों में मौजूद है, और निर्लिप भी स्वयं ही है।```
```हे प्रभु! तू खुद ही अपने आप को रचना से अलग जानता है, और खुद ही हर जगह हाजर-नाजर है। तू स्वयं ही छुपा हुआ है, और प्रकट भी स्वयं ही है। तेरी इस रचना का मूल्य किसी ने नहीं पाया। तू गंभीर है, तेरी थाह नहीं पड़ सकती, तू बेअंत है, तेरे गुण गिने नहीं जा सकते।```
```हे नानक! हर जगह एक प्रभु ही मौजूद है। हे प्रभु! एक तू ही तू है।22। सुधु।```
``` रामकली रागिनी की यह ‘वार’ जो राय बलवंड और सते डूम ने सुनाई थी।```
``` (किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे, उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव, मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरु के ऊँचे दर्जे को बयान कर सकूँ?) संसार-समुंदर से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं, वह गुण सतिगुरु जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव,) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरु) नानक देव जी ने सच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है।```
``` गुरु अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से, जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के, (बाबा) लहिणा जी के सिर पर, जो महिमा करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे, गुरु नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा।```
``` (अब) अपनी सलामती में ही गुरु नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका, और सतिगुरु जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरु गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया।1।```
``` (जब गुरु नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया, तब) गुरु नानक साहिब की महिमा की धूम की इनायत से, बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरु नानक साहिब वाली) ज्योति थी, जीवन का ढंग भी वही (गुरु नानक साहिब वाला) था, गुरु (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था।```
``` (बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रूहानी छत्र झूल रहा है। गुरु नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरु नानक देव जी से ‘नाम’ पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरु नानक साहिब के फरमाए हुए हुक्म को पाल रहे हैं: यह ‘हुक्म पालण’-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।```
*सुधु ॥*
कीतो रचनु = जगत रचना रची। रतिआ = (रचना में) मिला हुआ है। इकु = निराकार रूप स्वयं ही स्वयं। बहु भतिआ = सरगुण रूप में अनेक रंगों रूपों वाला। मंझि = में। जाणहि = तू जानता है। दूरि = रची हुई रचना से अलग। तेरी थटीऐ = तेरी कुदरति की। अगणतु = जिसके गुण गिने ना जा सकें।
```ये जगत-रचना प्रभु ने स्वयं ही रची है, और स्वयं ही इसमें मिला हुआ है। (कभी रचना को समेट के) एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है, कभी अनेक रंगों-रूपों वाला बन जाता है। प्रभु स्वयं ही सारे जीवों में मौजूद है, और निर्लिप भी स्वयं ही है।```
```हे प्रभु! तू खुद ही अपने आप को रचना से अलग जानता है, और खुद ही हर जगह हाजर-नाजर है। तू स्वयं ही छुपा हुआ है, और प्रकट भी स्वयं ही है। तेरी इस रचना का मूल्य किसी ने नहीं पाया। तू गंभीर है, तेरी थाह नहीं पड़ सकती, तू बेअंत है, तेरे गुण गिने नहीं जा सकते।```
```हे नानक! हर जगह एक प्रभु ही मौजूद है। हे प्रभु! एक तू ही तू है।22। सुधु।```
*रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी*
राइ बलवंडि = राय बलवंड ने। तथा = और। सतै = सते ने। डूमि = डूम ने,मिरासी ने, रबाबी ने। सतै डूमि = सते रबाबी ने। आखी = उचारण की, सुनाई।
```रामकली रागिनी की यह ‘वार’ जो राय बलवंड और सते डूम ने सुनाई थी।```
*ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*
नाउ = नाम, मशहूरी, प्रसिद्धि, इज्जत, महिमा, बड़ाई। बोलु = वचन, बात। जोखीवदै = जोखने के लिए, तोले जाने के लिए, (उस प्रसिद्धि को) मापने के लिए। किउ होवै = कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता। दे गुना सति = सति आदि दैवी गुण। पारंगति = पार लंघा सकने वाली आत्मिक अवस्था। दानु = बख्शिश। पड़ीवदै = प्राप्त करने के लिए। नानकि = नानक ने। कोटु = किला। सताणी = ताण वाली, बल वाली। नीव = नींव। दै = दे के।
धरिओनु = धरा उनि (गुरु नानक ने)। लहणे धरिओनु छतु सिरि = लहणे सिरि छतु धरिओनु, लहणे के सिर पर उन्होंने (गुरु नानक देव जी ने) छत्र रखा। करि सिफती = तारीफ करके, सराहना करके। अंम्रितु पीवदै = नाम अमृत पीते (लहणे जी के सिर पर)। मति गुर आतम देव दी = आतमदेव गुरु की मति के द्वारा। आतमदेव = अकाल पुरख। खड़गि = खड़ग से। जोरि = जोर से। पराकुइ = पराक्रम द्वारा, ताकत से।
जीअ = जीव दान, आत्म दान, आत्मिक जीवन। दै = दे कर। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल।
गुरि = गुरु ने, गुरु नानक देव जी ने। चेले रहिरासि = चेले (बाबा लहिणा जी) की रहरासि। रहरासि = अरदास, प्रणाम, नमस्कार। कीई = की। गुरि नानकि = गुरु नानक ने। सलामति थीवदै = सलामत होते ही, अपनी सलामती में ही, शारीरिक तौर पर जीवित होते ही। सहि = सहु ने, मालिक ने, गुरु ने। दितोसु = दिया उसको। जीवदै = जीवित रहते हुए ही।
लहणे दी = लहणे की (दोही), बाबा लहणा जी की महिमा की धूम। फेराईऐ = फिर गई, मच गई, पसर गई, बिखर गई। नानका दोही खटीऐ = (गुरु) नानक की दोहाई की इनायत से। दोही = शोभा की धूम। खटीऐ = कमाई के कारण, इनायत से। साइ = वही। जुगति = जीवन का ढंग। सहि = सहु (गुरु) ने। काइआ = काया, शरीर।
सु छत्रु निरंजनी = सुंदर रूहानी छत्र। मलि = मल के, संभाल के। गुर हटीऐ = गुरु (नानक) की दुकान में, गुरु नानक के घर में। करहि = (बाबा लहिणा जी) करते हैं। गुर फुरमाइआ = गुरु का फरमाया हुआ हुक्म। जोगु = ‘गुर फरमाइआ’ रूप जोग। सिल अलूणी चटीऐ = (गुरु का हुक्म कमाले-रूपी जोग, जो) अलूणी शिला चाटने के समान (बहुत ही मुश्किल काम) है।
```(किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे, उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव, मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरु के ऊँचे दर्जे को बयान कर सकूँ?) संसार-समुंदर से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं, वह गुण सतिगुरु जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव,) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरु) नानक देव जी ने सच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है।```
``` गुरु अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से, जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के, (बाबा) लहिणा जी के सिर पर, जो महिमा करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे, गुरु नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा।```
``` (अब) अपनी सलामती में ही गुरु नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका, और सतिगुरु जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरु गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया।1।```
``` (जब गुरु नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया, तब) गुरु नानक साहिब की महिमा की धूम की इनायत से, बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरु नानक साहिब वाली) ज्योति थी, जीवन का ढंग भी वही (गुरु नानक साहिब वाला) था, गुरु (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था।```
``` (बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रूहानी छत्र झूल रहा है। गुरु नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरु नानक देव जी से ‘नाम’ पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरु नानक साहिब के फरमाए हुए हुक्म को पाल रहे हैं: यह ‘हुक्म पालण’-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।```
*नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ॥ दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ॥ नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ॥*
नाउ = नाम, मशहूरी, प्रसिद्धि, इज्जत, महिमा, बड़ाई। बोलु = वचन, बात। जोखीवदै = जोखने के लिए, तोले जाने के लिए, (उस प्रसिद्धि को) मापने के लिए। किउ होवै = कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता। दे गुना सति = सति आदि दैवी गुण। पारंगति = पार लंघा सकने वाली आत्मिक अवस्था। दानु = बख्शिश। पड़ीवदै = प्राप्त करने के लिए। नानकि = नानक ने। कोटु = किला। सताणी = ताण वाली, बल वाली। नीव = नींव। दै = दे के।
```(किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे, उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव, मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरु के ऊँचे दर्जे को बयान कर सकूँ?) संसार-समुंदर से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं, वह गुण सतिगुरु जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव,) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरु) नानक देव जी ने सच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है।```
*लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अम्रितु पीवदै ॥ मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ॥*
धरिओनु = धरा उनि (गुरु नानक ने)। लहणे धरिओनु छतु सिरि = लहणे सिरि छतु धरिओनु, लहणे के सिर पर उन्होंने (गुरु नानक देव जी ने) छत्र रखा। करि सिफती = तारीफ करके, सराहना करके। अंम्रितु पीवदै = नाम अमृत पीते (लहणे जी के सिर पर)। मति गुर आतम देव दी = आतमदेव गुरु की मति के द्वारा। आतमदेव = अकाल पुरख। खड़गि = खड़ग से। जोरि = जोर से। पराकुइ = पराक्रम द्वारा, ताकत से।
जीअ = जीव दान, आत्म दान, आत्मिक जीवन। दै = दे कर। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल।
```गुरु अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से, जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के, (बाबा) लहिणा जी के सिर पर, जो महिमा करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे, गुरु नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा।```
*गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ॥ सहि टिका दितोसु जीवदै ॥१॥*
गुरि = गुरु ने, गुरु नानक देव जी ने। चेले रहिरासि = चेले (बाबा लहिणा जी) की रहरासि। रहरासि = अरदास, प्रणाम, नमस्कार। कीई = की। गुरि नानकि = गुरु नानक ने। सलामति थीवदै = सलामत होते ही, अपनी सलामती में ही, शारीरिक तौर पर जीवित होते ही। सहि = सहु ने, मालिक ने, गुरु ने। दितोसु = दिया उसको। जीवदै = जीवित रहते हुए ही।
```(अब) अपनी सलामती में ही गुरु नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका, और सतिगुरु जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरु गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया।1।```
*लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥ जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥*
लहणे दी = लहणे की (दोही), बाबा लहणा जी की महिमा की धूम। फेराईऐ = फिर गई, मच गई, पसर गई, बिखर गई। नानका दोही खटीऐ = (गुरु) नानक की दोहाई की इनायत से। दोही = शोभा की धूम। खटीऐ = कमाई के कारण, इनायत से। साइ = वही। जुगति = जीवन का ढंग। सहि = सहु (गुरु) ने। काइआ = काया, शरीर।
```(जब गुरु नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया, तब) गुरु नानक साहिब की महिमा की धूम की इनायत से, बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरु नानक साहिब वाली) ज्योति थी, जीवन का ढंग भी वही (गुरु नानक साहिब वाला) था, गुरु (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था।```
*झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटीऐ ॥ करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ॥*
सु छत्रु निरंजनी = सुंदर रूहानी छत्र। मलि = मल के, संभाल के। गुर हटीऐ = गुरु (नानक) की दुकान में, गुरु नानक के घर में। करहि = (बाबा लहिणा जी) करते हैं। गुर फुरमाइआ = गुरु का फरमाया हुआ हुक्म। जोगु = ‘गुर फरमाइआ’ रूप जोग। सिल अलूणी चटीऐ = (गुरु का हुक्म कमाले-रूपी जोग, जो) अलूणी शिला चाटने के समान (बहुत ही मुश्किल काम) है।
```(बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रूहानी छत्र झूल रहा है। गुरु नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरु नानक देव जी से ‘नाम’ पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरु नानक साहिब के फरमाए हुए हुक्म को पाल रहे हैं: यह ‘हुक्म पालण’-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।```