Guruvaani - 965

पउड़ी ॥ जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥ जिसु गुर मिलि कमलु प्रगासिआ सो अनदिनु जागा ॥ लगा रंगु चरणारबिंद सभु भ्रमु भउ भागा ॥ आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥ जिसहि धिआइआ पारब्रहमु सो कलि महि तागा ॥ साधू संगति निरमला अठसठि मजनागा ॥ जिसु प्रभु मिलिआ आपणा सो पुरखु सभागा ॥ नानक तिसु बलिहारणै जिसु एवड भागा ॥१७॥

मसतकि = माथे पर। करमु = बख्शिश, प्रभु की बख्शिश का लेखा। जिसु कमलु = जिसका हृदय कमल। अनदिनु = हर रोज, सदा। जागा = (विकारों की घात की ओर से) सचेत। चरणारबिंद = चरण +अरविंद। अरविंद = कमल का फूल। आगंजत = अविनाशी प्रभु। पागा = पा लेता है। जिसहि = जिस ही ने। तागा = मुकाबला करने योग्य। मजनागा = स्नान।

जिस मनुष्य के माथे पर प्रभु की कृपा (के लेख) हों वह प्रभु की सेवा-भक्ति में लगता है। गुरु को मिल के जिस मनुष्य का हृदय-कमल खिल उठता है, वह (विकारों के हमलों से) सदा सचेत रहता है। जिस मनुष्य (के मन) में प्रभु के सुंदर चरणों का प्यार होता है, उसकी भटकना उसका डर-भय दूर हो जाता है, क्योंकि गुरु की मति ले के वह अपने मन को जीत लेता है, और उसको अविनाशी प्रभु मिल जाता है।
जिस ही मनुष्य ने परमात्मा प्रभु को स्मरण किया है वह संसार में (विकारों का) मुकाबला करने के योग्य हो जाता है, गुरमुखों की संगति में उसका मन पवित्र हो जाता है, मानो, उसने अढ़सठ तीर्थों का स्नान करि लिया है।
भाग्यशाली है वह मनुष्य जिसको प्यारा प्रभु मिल गया। हे नानक! (कह:) मैं सदके हूँ उस पर से जिसके इतने बड़े भाग्य हैं।17।


सलोक मः ५ ॥ जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥ जां पिरु बाहरि तां धन माहरि ॥ बिनु नावै बहु फेर फिराहरि ॥ सतिगुरि संगि दिखाइआ जाहरि ॥ जन नानक सचे सचि समाहरि ॥१॥

पिरु = पति परमात्मा। अंदरि = हृदय में (प्रत्यक्ष)। धन = जीव-स्त्री। बाहरि = निर्लिप (धंधों से)। जां पिरु बाहरि = जब पति प्रभु जीव-स्त्री की याद से परे हो जाता है। माहरि = चौधराणी, धंधों में खचित। फेर = जन्मों के चक्कर, भटकना। सतिगुरि = गुरु ने। संगि = अंदर साथ ही। सचे सचि = निर्मल सदा स्थिर हरि में। समाहरि = समाया रहता है, टिका रहता है। जाहरि = प्रत्यक्ष।

जब पति-प्रभु जीव-स्त्री के हृदय में प्रत्यक्ष मौजूद हो, तो जीव-स्त्री मायावी धंधों झमेलों से निर्लिप रहती है। जब पति-प्रभु याद से दूर हो जाए, तो जीव-स्त्री मायावी-धंधों में खचित होने लग जाती है। प्रभु की याद के बिना जीव अनेक भटकनों में भटकता है।
हे दास नानक! जिस मनुष्य को गुरु ने हृदय में प्रत्यक्ष प्रभु दिखा दिया, वह सदा स्थिर प्रभु में ही टिका रहता है।1।


मः ५ ॥ आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥ नानक जितु आहरि जगु उधरै विरला बूझै कोइ ॥२॥

सभि = सारे। इकु आहरु = एक प्रभु की याद करने का उद्यम। जितु आहरि = जिस प्रयास से, जिस उद्यम से। उधरै = (विकारों से) बचता है (उद्धार होता है)।

हे नानक! मनुष्य अन्य सारे उद्यम करता फिरता है, पर एक प्रभु के स्मरण का प्रयास नहीं करता। जिस उद्यम से जगत विकारों से बच सकता है (उस उद्यम को) कोई विरला मनुष्य ही समझता है।


पउड़ी ॥ वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥ रंग परंग अनेक न जापन्हि करतबा ॥ जीआ अंदरि जीउ सभु किछु जाणला ॥ सभु किछु तेरै वसि तेरा घरु भला ॥ तेरै घरि आनंदु वधाई तुधु घरि ॥ माणु महता तेजु आपणा आपि जरि ॥ सरब कला भरपूरु दिसै जत कता ॥ नानक दासनि दासु तुधु आगै बिनवता ॥१८॥

अपारु = अ+पारु, जिसका परला छोर ना मिल सके। दर्जा = रुतबा। रंग परंग = रंग बिरंगे। न जापनि = समझे नहीं जा सकते। जीउ = जिंद, सहारा। जाणला = जानने वाला। वसि = वश में। भला = सोहना। घरि = घर में। तुधु घरि = तेरे घर में। वधाई = खुशियाँ, शादियाने। महता = महत्वता, बड़ाई। तेजु = प्रताप। जरि = जरता है। कला = ताकत, सत्ता। जत कता = हर जगह। दासनि दासु = दासों का दास।

हे प्रभु! तेरा बेअंत ही बड़ा रुतबा है, (संसार में) तेरे अनेक ही किस्मों के करिश्मे हो रहे हैं जो समझे नहीं जा सकते। सब जीवों के अंदर तू ही जिंद-रूप है, तू (जीवों की) हरेक बात जानता है। सुंदर है तेरा ठिकाना, सारी सृष्टि तेरे ही वश में है।
(इतनी सृष्टि का मालिक होते हुए भी) तेरे हृदय में सदा आनंद और खुशियाँ हैं, तू अपने इतने बड़े मान-सम्मान के प्रताप को खुद ही जरता है (सहता है)।
(हे भाई!) सारी ताकतों का मालिक प्रभु हर जगह दिख रहा है। हे प्रभु! नानक तेरे दासों का दास तेरे आगे (ही) अरदास विनती करता है।18।


सलोक मः ५ ॥ छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥ वखरु हिकु अपारु नानक खटे सो धणी ॥१॥

छतड़े = (आकाश छत से) छते हुए। बाजार = सारा जगत मण्डल (मानो, बाजार है)। विचि = इन जगत मण्डलों में। वपारीए = प्रभु नाम का व्यापार करने वाले। वखरु = प्रभु नाम का सौदा। हिकु = एक। धणी = धनाढ, धनवंत। अपारु = कभी ना खत्म होने वाला।

(इसके ऊपर दिखते आकाश छत के नीचे) छता हुआ (बेअंत जगत-मण्डल, जैसे) बाजार हैं, इनमें (प्रभु के नाम का व्यापार करने वाले जीव-) व्यापारी ही खूबसूरत लगते हैं। हे नानक! (इस जगत-मण्डल में) वह मनुष्य धनवान हैं जो एक अखुट हरि-नाम का सौदा ही कमाता है।1।


महला ५ ॥ कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥ जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥२॥

हे कबीर! जिस परमात्मा ने ये रचना रची है, हम तो उसी की याद में टिके रहते हैं, क्योंकि ना कोई हमारा ही सदा का साथी है, और ना ही हम ही सदा के लिए साथी बन सकते हैं (बेड़ी की यात्रा का मेला है)।2।


पउड़ी ॥ सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अम्रिता ॥ मनु लोचै उन्ह मिलण कउ किउ वंञै घिता ॥ वरना चिहना बाहरा ओहु अगमु अजिता ॥ ओहु पिआरा जीअ का जो खोल्है भिता ॥ सेवा करी तुसाड़ीआ मै दसिहु मिता ॥ कुरबाणी वंञा वारणै बले बलि किता ॥ दसनि संत पिआरिआ सुणहु लाइ चिता ॥ जिसु लिखिआ नानक दास तिसु नाउ अम्रितु सतिगुरि दिता ॥१९॥

सफलिउ = फल वाला, जो हरेक के मेहनत को फल लगाए। सुहावड़ा = सोहाना। घिता वंञै = लिया जा सके। वरन = रंग। चिहन = निशान। अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। जीअ का = जिंद का। भिता = भेद। करी = मैं करूँ। मै = मुझे। मिता = हे मित्र! बले बलि = बलिहार। किता = किया। दसनि = बताते हैं। सतिगुरि = सतिगुरु ने। अंमित = आत्मिक जीवन देने वाले।

परमात्मा (जैसे) एक खूबसूरत फलदार वृक्ष है जिस पर आत्मिक जीवन देने वाले फल लगे हुए हैं।
मेरा मन उस प्रभु को मिलने के लिए तड़पता है (पर पता नहीं लगता कि) कैसे मिला जाए क्योंकि ना उसका कोई रंग है ना निशान, उस तक पहुँचा नहीं जा सकता, उसको जीता नहीं जा सकता।
जो सज्जन, (मुझे) ये भेद समझा दे, वह मेरी जिंद-जान को प्यारा लगेगा। हे मित्र! मुझे (यह भेद) बताओ, मैं तुम्हारी सेवा करूँगा, मैं तुमसे सदके कुर्बान वारने जाऊँगा।
प्यारे संत (गुरसिख वह भेद) बताते हैं (और कहते हैं कि) ध्यान से सुन- हे दास नानक! जिसके माथे पर लेख लिखा (उघड़ता) है उसको सतिगुरु ने प्रभु का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है।19।


सलोक महला ५ ॥ कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥ धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥१॥

धरती साध की = सतिगुरु की धरती, सतिगुरु की संगति। तसकर = चोर, विकारी लोग। बैसहि = आ बैठते हैं, अगर आ के बैठें। गाहि = गहि, पकड़ के, सिदक से, और विचार त्याग के। भारि = भार से, भार तले, तस्करों के भार के नीचे। न बिआपई = दबती नहीं, असर तले नहीं आती। उन कउ = उन (तस्करों) को। लाहू = लाहा ही, लाभ ही (मिलता है)। लाहि = लहहिं, लेते हैं, वे विकारी बल्कि लाभ ही उठाते हैं।1।
तुख = तोह, चावलों के छिलके। लाइ = लाय, लगती है, बजती है।2।
वड परवारु = (जगत रूप) बड़े परिवार वाला। इकातीआ = एकांत में रहने वाला, अकेला रहने वाला। जातीआ = जाणी। उपंनीआ = पैदा हुआ, दिखते रूप में आया। वरंनिआ = वर्णन किया। वुठा = बसा। तूं डिठा = तुझे देखा। भेटै = मिले। सुधु = पवित्र।

हे कबीर! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यवश) और ताक छोड़ के सतिगुरु की संगति में आ के बैठें, तो विकारियों का असर उस संगत पर नहीं पड़ता। हाँ, विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है, वे विकारी व्यक्ति जरूर लाभ उठाते हैं।1।
हे कबीर! (तोख से) चावल (अलग करने) के लिए (छाँटने वक्त) तोखों को मोहली (की चोट) बजती है। इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबत में बैठता है (वह भी विकारों की मार खाता है, विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है।2।
हे प्रभु! तू खुद ही (जगत रूप) बड़े परिवार वाला है, और (इससे निर्लिप) अकेला रहने वाला भी है। अपनी प्रतिभा की कद्र बनाने वाला भी तू स्वयं ही है, और कद्र जानने वाला भी तू खुद ही है। ये सारा जगत तेरा अपना ही (सरगुण) रूप है, और ये तुझसे ही इस दिखाई देते रूप में आया है, इस सारे पैदा किए हुए जगत को रंग-रूप देने वाला भी तू खुद ही है।
वह स्थान भाग्यशाली है जहाँ, हे प्रभु! तू बसता है, तेरे वह भक्त भाग्यशाली हैं जिन्होंने तेरा दीदार किया है।
वही सख्श तेरी महिमा कर सकता है जिस पर तेरी मेहर होती है। हे नानक! (प्रभु की मेहर से) जिसको गुरु मिल जाए, वह शुद्ध पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है।20।


महला ५ ॥ कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥ संगि कुसंगी बैसते तब पूछे धरम राइ ॥२॥

धरती साध की = सतिगुरु की धरती, सतिगुरु की संगति। तसकर = चोर, विकारी लोग। बैसहि = आ बैठते हैं, अगर आ के बैठें। गाहि = गहि, पकड़ के, सिदक से, और विचार त्याग के। भारि = भार से, भार तले, तस्करों के भार के नीचे। न बिआपई = दबती नहीं, असर तले नहीं आती। उन कउ = उन (तस्करों) को। लाहू = लाहा ही, लाभ ही (मिलता है)। लाहि = लहहिं, लेते हैं, वे विकारी बल्कि लाभ ही उठाते हैं।1।
तुख = तोह, चावलों के छिलके। लाइ = लाय, लगती है, बजती है।2।

हे कबीर! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यवश) और ताक छोड़ के सतिगुरु की संगति में आ के बैठें, तो विकारियों का असर उस संगत पर नहीं पड़ता। हाँ, विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है, वे विकारी व्यक्ति जरूर लाभ उठाते हैं।1।
हे कबीर! (तोख से) चावल (अलग करने) के लिए (छाँटने वक्त) तोखों को मोहली (की चोट) बजती है। इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबत में बैठता है (वह भी विकारों की मार खाता है, विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है।2।


पउड़ी ॥ आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥ आपणी कीमति आपि आपे ही जातीआ ॥ सभु किछु आपे आपि आपि उपंनिआ ॥ आपणा कीता आपि आपि वरंनिआ ॥ धंनु सु तेरा थानु जिथै तू वुठा ॥ धंनु सु तेरे भगत जिन्ही सचु तूं डिठा ॥ जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥ जिसु गुर भेटे नानक निरमल सोई सुधु ॥२०॥

वड परवारु = (जगत रूप) बड़े परिवार वाला। इकातीआ = एकांत में रहने वाला, अकेला रहने वाला। जातीआ = जाणी। उपंनीआ = पैदा हुआ, दिखते रूप में आया। वरंनिआ = वर्णन किया। वुठा = बसा। तूं डिठा = तुझे देखा। भेटै = मिले। सुधु = पवित्र।

हे प्रभु! तू खुद ही (जगत रूप) बड़े परिवार वाला है, और (इससे निर्लिप) अकेला रहने वाला भी है। अपनी प्रतिभा की कद्र बनाने वाला भी तू स्वयं ही है, और कद्र जानने वाला भी तू खुद ही है। ये सारा जगत तेरा अपना ही (सरगुण) रूप है, और ये तुझसे ही इस दिखाई देते रूप में आया है, इस सारे पैदा किए हुए जगत को रंग-रूप देने वाला भी तू खुद ही है।
वह स्थान भाग्यशाली है जहाँ, हे प्रभु! तू बसता है, तेरे वह भक्त भाग्यशाली हैं जिन्होंने तेरा दीदार किया है।
वही सख्श तेरी महिमा कर सकता है जिस पर तेरी मेहर होती है। हे नानक! (प्रभु की मेहर से) जिसको गुरु मिल जाए, वह शुद्ध पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है।20।