*Guruvaani - 858*
*गिआन अंजनु मो कउ गुरि दीना ॥ राम नाम बिनु जीवनु मन हीना ॥१॥ रहाउ॥*
अंजनु = सुरमा। गुरि = गुरु ने। मन = हे मन! हीना = तुच्छ, नकारा।1। रहाउ।
```मुझे सतिगुरु ने अपने ज्ञान का (ऐसा) सुरमा दिया है कि हे मन! अब प्रभु की बंदगी के बिना जीना व्यर्थ लगता है।1। रहाउ।```
*नामदेइ सिमरनु करि जानां ॥ जगजीवन सिउ जीउ समानां ॥२॥१॥*
नामदेइ = नामदेव को। करि = कर के। जानां = जान लिया है, पहचान लिया है। सिउ = साथ। जीउ = जिंद। समानां = लीन हो गई है।2।
```मैं नामदेव ने प्रभु का भजन करके प्रभु से सांझ डाल ली है और जगत-के-आसरे प्रभु में मेरे प्राण लीन हो गए हैं।2।1।```
*बिलावलु बाणी रविदास भगत की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*
दारिदु = गरीबी। सभ को = हरेक बंदा। हसै = मजाक करता है। दसा = दशा, हालत। असट दसा = अठारह। कर तलै = हाथ की तली पर, काबू में।1।
मै किछु नही = मै कुछ भी नहीं, मेरी कोई बिसात नहीं। भवखंडन = हे जनम मरण नाश करने वाले! जीअ = जीव। पूरन काम = हे सबकी कामना पूरी करने वाले!।1। रहाउ।
सरनागता = शरण आए हैं। भारु = बोझ (विकारों का)। तुम ते = तेरी मेहर से। ते = से। आलजु = (इस शब्द के दो हिस्से ‘आल’ और ‘जु’ करना ठीक नहीं, अलग-अलग करके पाठ करना ही असंभव हो जाता है। ‘आलजु’ का अर्थ ‘अलजु’ करना भी गलत होगा; ‘आ’ और ‘अ’ में बहुत फर्क है। वाणी मैं ‘अलजु’ शब्द नहीं है, ‘निरलजु’ शब्द ही आया है। आम बोलचाल में भी हम ‘निरलज’ ही कहते हैं) आल+जु। आल = आलय, बेहतर, घर, गृहस्थ का जंजाल। आलजु = गृहस्थ के जंजालों से पैदा हुआ, जंजालों से भरा हुआ।2।
अकथ = अ+कथ, बयान से परे। बहु = बहत बात। काइ = किस लिए? उपमा = तशबीह, बराबरी, तुलना।3।
जिह कुल = जिस कुल में। बैसनौ = वैश्णव, परमात्मा का भक्त। होइ = पैदा हो जाए। बरन = वर्ण, ऊँची जाति। अबरन = नीच जाति। रंकु = गरीब। ईसुरु = धनाड, अमीर। बिमल बासु = निरमल शोभा वाला। बासु = सुगंधि, अच्छी शोभा। जगि = जगत में। सोइ = वह मनुष्य।1। रहाउ।
डोम = डूम, मरासी। मलेछ मन = मलीन मन वाला। आपु = अपने आप को। तारि = तार के। दोइ = दोनों।1।
धंनि = भाग्यशाली। गाउ = गाँव। ठाउ = जगह। लोइ = जगत में। जिनि = जिस ने। सार = श्रेष्ठ। तजे = त्यागे। आन = अन्य। मगन = मस्त। बिखु = जहर। खोइ डारे = नाश कर दिया।2।
सूर = सूरमा। छत्रपति = छत्र धारी। पुरैन पात = जल कुदमिनी के पत्र, जलकुम्भी के पत्ते। समीप = नजदीक। रहै = रह सकती है, जी सकती है। भनि = कहता है। जनमे = पैदा हुए हैं। जनमे ओइ = वही पैदा हुए हैं, उनका ही पैदा होना सफल है। ओइ = वह लोग।3।
न्रिप = राजा। के कारने = की खातिर। भेखधारी = भेस धारण करने वाला, सिर्फ धार्मिक लिबास वाला, जिसने लोक दिखावे की खातिर बाहरी धार्मिक चिन्ह रखे हुए हों पर अंदर से धर्म की ओर से कोरा हो। कामारथी = कामी, काम-वासना पूरी करने का चाहवान। सुआरथी = स्वार्थी। वा की = उस (भेषधारी) की। पैज सवारी = सत्कार रखी, (उसे) विकारों में गिरने से बचा लिया।1।
तव = तेरे। कहा = कहाँ? जगत गुरा = हे जगत के गुरु! जउ = अगर। करमु = किए कर्मों का फल। कत = किस लिए? जंबुकु = गीदड़। ग्रासे = खा जाए।1। रहाउ।
बूँद जल = जल की बूँद। चात्रिक = पपीहा। प्रान गए = प्राण चले गए। सागरु = समुंदर। फुनि = फिर, प्राण चले जाने के बाद।2।
बिरमावउ = मैं धीरज दूँ। बूडि मूए = यदि डूब के मरे। नउका = नौका, बेड़ी। काहि = किसको? चढावउ = मैं चढ़ाऊँगा।3।
मोरा = मेरा। अउसर = अवसर, समय। अउसर लजा = सत्कार रखने का समय है। तोरा = तेरा।4।
```हरेक आदमी (किसी की) गरीबी देख के मजाक उड़ाता है, (और) ऐसी ही हालत मेरी भी थी (कि लोग मेरी गरीबी पर मजाक किया करते थे), पर अब अठारह सिद्धियां मेरी हथेली पर (नाचती) हैं; हे प्रभु ये सारी तेरी मेहर है।1।```
``` हे जीवों के जनम-मरण के चक्कर खत्म करने वाले राम! हे सबकी कामना पूरी करने वाले प्रभु! सारे जीव-जंतु तेरी ही शरण आते हैं (मैं गरीब भी तेरी ही शरण में हूँ) तू जानता है कि मेरी अपनी कोई बिसात नहीं है।1। रहाउ।```
``` चाहे उच्च जाति वाले हों, चाहे नीच जाति वाले, जो जो भी तेरी शरण आते हैं, उनकी (आत्मा) पर (विकारों का) वज़न भार नहीं रह जाता, इस वास्ते वे तेरी मेहर से इस बखेड़ों भरे संसार (समुंदर) में से (आसानी से) पार हो जाते हैं।2।```
``` रविदास कहता है: हे प्रभु! तेरे गुण बयान नहीं किए जा सकते (तू कंगालों को भी शहनशाह बनाने वाला है), चाहे कितने भी प्रयत्न करें, तेरे गुण नहीं कहे जा सकते। अपने जैसा तम स्वयं ही है; (जगत) में कोई ऐसा नहीं जिसको तेरे जैसा कहा जा सके।3।1।```
``` जिस किसी भी कुल में परमात्मा का भक्त पैदा हो जाए, चाहे वह अच्छी जाति का है चाहे नीच जाति का है, चाहे कंगाल है चाहे धनाढ, (उसकी जाति व धन आदि का वर्णन ही) नहीं (छिड़ता), वह जगत में निर्मल शोभा वाला प्रसिद्ध होता है।1। रहाउ।```
``` कोई ब्राहमण हो, क्षत्रिय हो, डूम-चण्डाल अथवा मलीन मन वाला हो, परमात्मा के भजन से मनुष्य पवित्र हो जाता है; वह अपने आप को (संसार-समुंदर से) पार करके अपनी दोनों कुलें भी तैरा लेता है।1।```
``` संसार में वह गाँव मुबारक है, वह स्थान धन्य है, वह पवित्र कुल भाग्यशाली है, (जिसमें पैदा हो के) किसी ने परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस पीया है, अन्य (बुरे) रस छोड़े हैं, और, प्रभु के नाम-रस में मस्त हो के (विकार-वासना का) जहर (अपने अंदर से) नाश कर दिया है।2।```
``` बहुत विद्वान हो चाहे शूरवीर, चाहे छत्रपति राजा हो, कोई भी मनुष्य परमात्मा के भक्त के बराबर का नहीं हो सकता। रविदास कहता है: भक्तों का ही पैदा होना जगत में मुबारक है (वे प्रभु के चरणों में रह के ही जी सकते हैं), जैसे जल कुदमिनी पानी के समीप रह के ही (हरि) रह सकती है।3।2।```
``` हे प्रभु! तूने तो उस कामी और स्वार्थी व्यक्ति की भी इज्जत रखी (भाव, तूने उसको काम-वासना के विकार में गिरने से बचाया था) जिसने एक राजे की लड़की की खातिर (धार्मिक होने का) भेस धारण किया था।1।```
``` हे जगत के गुरु प्रभु! अगर मेरे पिछले किए कर्मों का फल नाश ना हुआ (भाव, यदि मैं अब भी पूर्बले किए हुए बुरे कर्मों के संस्कारों के मुताबक ही बुरे काम ही करता रहा) तो तेरी शरण आने का भी क्या लाभ? शेर की शरण आने का भी क्या फायदा, अगर फिर भी गीदड़ खा जाए?।1। रहाउ।```
``` पपीहा जल की एक बूँद के लिए दुखी होता है (और चिल्लाता है; पर इन्जार में ही) अगर उसके प्राण चले जाएं तो फिर (बाद में) उसको (पानी का) समुंदर भी मिल जाए तो उसके किसी काम नहीं आ सकता; (वैसे ही), हे प्रभु! अगर तेरे नाम-अमृत के बग़ैर मेरी जीवात्मा विकारों में मर गई, तो फिर तेरी मेहर का समुंदर मेरा क्या सवारेगा?।2।```
``` (तेरी मेहरबानियों का इन्तजार कर-करके) मेरी जीवात्मा थकी हुई है, (विकारों में) डोल रही है, इसे किस तरह विकारों से रोकूँ? हे प्रभु! यदि मैं (विकारों के समुंदर में) डूब ही गया, तो बाद में तेरी नौका मिल भी गई, तो, बता, उस बेड़ी में मैं किस को चढ़ाऊँगा?।3।```
``` हे प्रभु! मेरी कोई बिसात नहीं, मेरा कोई आसरा नहीं; (ये मानव जनम ही) मेरी इज्जत रखने का समय है, मैं सधना तेरा दास हूँ, मेरी इज्जत रख (और विकारों के समुंदर में डूबने से मुझे बचा ले)।4।1।```
*दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥ असट दसा सिधि कर तलै सभ क्रिपा तुमारी ॥१॥*
दारिदु = गरीबी। सभ को = हरेक बंदा। हसै = मजाक करता है। दसा = दशा, हालत। असट दसा = अठारह। कर तलै = हाथ की तली पर, काबू में।1।
```हरेक आदमी (किसी की) गरीबी देख के मजाक उड़ाता है, (और) ऐसी ही हालत मेरी भी थी (कि लोग मेरी गरीबी पर मजाक किया करते थे), पर अब अठारह सिद्धियां मेरी हथेली पर (नाचती) हैं; हे प्रभु ये सारी तेरी मेहर है।1।```
*तू जानत मै किछु नही भव खंडन राम ॥ सगल जीअ सरनागती प्रभ पूरन काम ॥१॥ रहाउ॥*
मै किछु नही = मै कुछ भी नहीं, मेरी कोई बिसात नहीं। भवखंडन = हे जनम मरण नाश करने वाले! जीअ = जीव। पूरन काम = हे सबकी कामना पूरी करने वाले!।1। रहाउ।
```हे जीवों के जनम-मरण के चक्कर खत्म करने वाले राम! हे सबकी कामना पूरी करने वाले प्रभु! सारे जीव-जंतु तेरी ही शरण आते हैं (मैं गरीब भी तेरी ही शरण में हूँ) तू जानता है कि मेरी अपनी कोई बिसात नहीं है।1। रहाउ।```
*जो तेरी सरनागता तिन नाही भारु ॥ ऊच नीच तुम ते तरे आलजु संसारु ॥२॥*
सरनागता = शरण आए हैं। भारु = बोझ (विकारों का)। तुम ते = तेरी मेहर से। ते = से। आलजु = (इस शब्द के दो हिस्से ‘आल’ और ‘जु’ करना ठीक नहीं, अलग-अलग करके पाठ करना ही असंभव हो जाता है। ‘आलजु’ का अर्थ ‘अलजु’ करना भी गलत होगा; ‘आ’ और ‘अ’ में बहुत फर्क है। वाणी मैं ‘अलजु’ शब्द नहीं है, ‘निरलजु’ शब्द ही आया है। आम बोलचाल में भी हम ‘निरलज’ ही कहते हैं) आल+जु। आल = आलय, बेहतर, घर, गृहस्थ का जंजाल। आलजु = गृहस्थ के जंजालों से पैदा हुआ, जंजालों से भरा हुआ।2।
```चाहे उच्च जाति वाले हों, चाहे नीच जाति वाले, जो जो भी तेरी शरण आते हैं, उनकी (आत्मा) पर (विकारों का) वज़न भार नहीं रह जाता, इस वास्ते वे तेरी मेहर से इस बखेड़ों भरे संसार (समुंदर) में से (आसानी से) पार हो जाते हैं।2।```
*कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करीजै ॥ जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै ॥३॥१॥*
अकथ = अ+कथ, बयान से परे। बहु = बहत बात। काइ = किस लिए? उपमा = तशबीह, बराबरी, तुलना।3।
```रविदास कहता है: हे प्रभु! तेरे गुण बयान नहीं किए जा सकते (तू कंगालों को भी शहनशाह बनाने वाला है), चाहे कितने भी प्रयत्न करें, तेरे गुण नहीं कहे जा सकते। अपने जैसा तम स्वयं ही है; (जगत) में कोई ऐसा नहीं जिसको तेरे जैसा कहा जा सके।3।1।```
*बिलावलु ॥ जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥ बरन अबरन रंकु नही ईसुरु बिमल बासु जानीऐ जगि सोइ ॥१॥ रहाउ॥*
जिह कुल = जिस कुल में। बैसनौ = वैश्णव, परमात्मा का भक्त। होइ = पैदा हो जाए। बरन = वर्ण, ऊँची जाति। अबरन = नीच जाति। रंकु = गरीब। ईसुरु = धनाड, अमीर। बिमल बासु = निरमल शोभा वाला। बासु = सुगंधि, अच्छी शोभा। जगि = जगत में। सोइ = वह मनुष्य।1। रहाउ।
```जिस किसी भी कुल में परमात्मा का भक्त पैदा हो जाए, चाहे वह अच्छी जाति का है चाहे नीच जाति का है, चाहे कंगाल है चाहे धनाढ, (उसकी जाति व धन आदि का वर्णन ही) नहीं (छिड़ता), वह जगत में निर्मल शोभा वाला प्रसिद्ध होता है।1। रहाउ।```
*ब्रहमन बैस सूद अरु ख्यत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ ॥ होइ पुनीत भगवंत भजन ते आपु तारि तारे कुल दोइ ॥१॥*
डोम = डूम, मरासी। मलेछ मन = मलीन मन वाला। आपु = अपने आप को। तारि = तार के। दोइ = दोनों।1।
```कोई ब्राहमण हो, क्षत्रिय हो, डूम-चण्डाल अथवा मलीन मन वाला हो, परमात्मा के भजन से मनुष्य पवित्र हो जाता है; वह अपने आप को (संसार-समुंदर से) पार करके अपनी दोनों कुलें भी तैरा लेता है।1।```
*धंनि सु गाउ धंनि सो ठाउ धंनि पुनीत कुट्मब सभ लोइ ॥ जिनि पीआ सार रसु तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ ॥२॥*
धंनि = भाग्यशाली। गाउ = गाँव। ठाउ = जगह। लोइ = जगत में। जिनि = जिस ने। सार = श्रेष्ठ। तजे = त्यागे। आन = अन्य। मगन = मस्त। बिखु = जहर। खोइ डारे = नाश कर दिया।2।
```संसार में वह गाँव मुबारक है, वह स्थान धन्य है, वह पवित्र कुल भाग्यशाली है, (जिसमें पैदा हो के) किसी ने परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस पीया है, अन्य (बुरे) रस छोड़े हैं, और, प्रभु के नाम-रस में मस्त हो के (विकार-वासना का) जहर (अपने अंदर से) नाश कर दिया है।2।```
*पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥ जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥३॥२॥*
सूर = सूरमा। छत्रपति = छत्र धारी। पुरैन पात = जल कुदमिनी के पत्र, जलकुम्भी के पत्ते। समीप = नजदीक। रहै = रह सकती है, जी सकती है। भनि = कहता है। जनमे = पैदा हुए हैं। जनमे ओइ = वही पैदा हुए हैं, उनका ही पैदा होना सफल है। ओइ = वह लोग।3।
```बहुत विद्वान हो चाहे शूरवीर, चाहे छत्रपति राजा हो, कोई भी मनुष्य परमात्मा के भक्त के बराबर का नहीं हो सकता। रविदास कहता है: भक्तों का ही पैदा होना जगत में मुबारक है (वे प्रभु के चरणों में रह के ही जी सकते हैं), जैसे जल कुदमिनी पानी के समीप रह के ही (हरि) रह सकती है।3।2।```
*बाणी सधने की रागु बिलावलु ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*
न्रिप = राजा। के कारने = की खातिर। भेखधारी = भेस धारण करने वाला, सिर्फ धार्मिक लिबास वाला, जिसने लोक दिखावे की खातिर बाहरी धार्मिक चिन्ह रखे हुए हों पर अंदर से धर्म की ओर से कोरा हो। कामारथी = कामी, काम-वासना पूरी करने का चाहवान। सुआरथी = स्वार्थी। वा की = उस (भेषधारी) की। पैज सवारी = सत्कार रखी, (उसे) विकारों में गिरने से बचा लिया।1।
तव = तेरे। कहा = कहाँ? जगत गुरा = हे जगत के गुरु! जउ = अगर। करमु = किए कर्मों का फल। कत = किस लिए? जंबुकु = गीदड़। ग्रासे = खा जाए।1। रहाउ।
बूँद जल = जल की बूँद। चात्रिक = पपीहा। प्रान गए = प्राण चले गए। सागरु = समुंदर। फुनि = फिर, प्राण चले जाने के बाद।2।
बिरमावउ = मैं धीरज दूँ। बूडि मूए = यदि डूब के मरे। नउका = नौका, बेड़ी। काहि = किसको? चढावउ = मैं चढ़ाऊँगा।3।
मोरा = मेरा। अउसर = अवसर, समय। अउसर लजा = सत्कार रखने का समय है। तोरा = तेरा।4।
```हे प्रभु! तूने तो उस कामी और स्वार्थी व्यक्ति की भी इज्जत रखी (भाव, तूने उसको काम-वासना के विकार में गिरने से बचाया था) जिसने एक राजे की लड़की की खातिर (धार्मिक होने का) भेस धारण किया था।1।```
``` हे जगत के गुरु प्रभु! अगर मेरे पिछले किए कर्मों का फल नाश ना हुआ (भाव, यदि मैं अब भी पूर्बले किए हुए बुरे कर्मों के संस्कारों के मुताबक ही बुरे काम ही करता रहा) तो तेरी शरण आने का भी क्या लाभ? शेर की शरण आने का भी क्या फायदा, अगर फिर भी गीदड़ खा जाए?।1। रहाउ।```
``` पपीहा जल की एक बूँद के लिए दुखी होता है (और चिल्लाता है; पर इन्जार में ही) अगर उसके प्राण चले जाएं तो फिर (बाद में) उसको (पानी का) समुंदर भी मिल जाए तो उसके किसी काम नहीं आ सकता; (वैसे ही), हे प्रभु! अगर तेरे नाम-अमृत के बग़ैर मेरी जीवात्मा विकारों में मर गई, तो फिर तेरी मेहर का समुंदर मेरा क्या सवारेगा?।2।```
``` (तेरी मेहरबानियों का इन्तजार कर-करके) मेरी जीवात्मा थकी हुई है, (विकारों में) डोल रही है, इसे किस तरह विकारों से रोकूँ? हे प्रभु! यदि मैं (विकारों के समुंदर में) डूब ही गया, तो बाद में तेरी नौका मिल भी गई, तो, बता, उस बेड़ी में मैं किस को चढ़ाऊँगा?।3।```
``` हे प्रभु! मेरी कोई बिसात नहीं, मेरा कोई आसरा नहीं; (ये मानव जनम ही) मेरी इज्जत रखने का समय है, मैं सधना तेरा दास हूँ, मेरी इज्जत रख (और विकारों के समुंदर में डूबने से मुझे बचा ले)।4।1।```
*न्रिप कंनिआ के कारनै इकु भइआ भेखधारी ॥ कामारथी सुआरथी वा की पैज सवारी ॥१॥*
न्रिप = राजा। के कारने = की खातिर। भेखधारी = भेस धारण करने वाला, सिर्फ धार्मिक लिबास वाला, जिसने लोक दिखावे की खातिर बाहरी धार्मिक चिन्ह रखे हुए हों पर अंदर से धर्म की ओर से कोरा हो। कामारथी = कामी, काम-वासना पूरी करने का चाहवान। सुआरथी = स्वार्थी। वा की = उस (भेषधारी) की। पैज सवारी = सत्कार रखी, (उसे) विकारों में गिरने से बचा लिया।1।
```हे प्रभु! तूने तो उस कामी और स्वार्थी व्यक्ति की भी इज्जत रखी (भाव, तूने उसको काम-वासना के विकार में गिरने से बचाया था) जिसने एक राजे की लड़की की खातिर (धार्मिक होने का) भेस धारण किया था।1।```
*तव गुन कहा जगत गुरा जउ करमु न नासै ॥ सिंघ सरन कत जाईऐ जउ ज्मबुकु ग्रासै ॥१॥ रहाउ॥*
तव = तेरे। कहा = कहाँ? जगत गुरा = हे जगत के गुरु! जउ = अगर। करमु = किए कर्मों का फल। कत = किस लिए? जंबुकु = गीदड़। ग्रासे = खा जाए।1। रहाउ।
```हे जगत के गुरु प्रभु! अगर मेरे पिछले किए कर्मों का फल नाश ना हुआ (भाव, यदि मैं अब भी पूर्बले किए हुए बुरे कर्मों के संस्कारों के मुताबक ही बुरे काम ही करता रहा) तो तेरी शरण आने का भी क्या लाभ? शेर की शरण आने का भी क्या फायदा, अगर फिर भी गीदड़ खा जाए?।1। रहाउ।```
*एक बूंद जल कारने चात्रिकु दुखु पावै ॥ प्रान गए सागरु मिलै फुनि कामि न आवै ॥२॥*
बूँद जल = जल की बूँद। चात्रिक = पपीहा। प्रान गए = प्राण चले गए। सागरु = समुंदर। फुनि = फिर, प्राण चले जाने के बाद।2।
```पपीहा जल की एक बूँद के लिए दुखी होता है (और चिल्लाता है; पर इन्जार में ही) अगर उसके प्राण चले जाएं तो फिर (बाद में) उसको (पानी का) समुंदर भी मिल जाए तो उसके किसी काम नहीं आ सकता; (वैसे ही), हे प्रभु! अगर तेरे नाम-अमृत के बग़ैर मेरी जीवात्मा विकारों में मर गई, तो फिर तेरी मेहर का समुंदर मेरा क्या सवारेगा?।2।```
*प्रान जु थाके थिरु नही कैसे बिरमावउ ॥ बूडि मूए नउका मिलै कहु काहि चढावउ ॥३॥*
बिरमावउ = मैं धीरज दूँ। बूडि मूए = यदि डूब के मरे। नउका = नौका, बेड़ी। काहि = किसको? चढावउ = मैं चढ़ाऊँगा।3।
```(तेरी मेहरबानियों का इन्तजार कर-करके) मेरी जीवात्मा थकी हुई है, (विकारों में) डोल रही है, इसे किस तरह विकारों से रोकूँ? हे प्रभु! यदि मैं (विकारों के समुंदर में) डूब ही गया, तो बाद में तेरी नौका मिल भी गई, तो, बता, उस बेड़ी में मैं किस को चढ़ाऊँगा?।3।```
*मै नाही कछु हउ नही किछु आहि न मोरा ॥ अउसर लजा राखि लेहु सधना जनु तोरा ॥४॥१॥*
मोरा = मेरा। अउसर = अवसर, समय। अउसर लजा = सत्कार रखने का समय है। तोरा = तेरा।4।
```हे प्रभु! मेरी कोई बिसात नहीं, मेरा कोई आसरा नहीं; (ये मानव जनम ही) मेरी इज्जत रखने का समय है, मैं सधना तेरा दास हूँ, मेरी इज्जत रख (और विकारों के समुंदर में डूबने से मुझे बचा ले)।4।1।```