*Guruvaani - 988*

 

*आल जाल बिकार तजि सभि हरि गुना निति गाउ ॥ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै देहु अपना नाउ ॥२॥१॥६॥*

आल = (आलय) घर। आल जाल = घर के जंजाल। तजि = छोड़ के। नित = सदा। गाउ = गाया करो। कर = (दोनों) हाथ (बहुवचन)। जोड़ि = जोड़ के। मांगै = माँगता है।2।

```हे भाई! माया के मोह के जंजाल छोड़ के विकार त्याग के सदा परमात्मा के गुण गाया कर। दास नानक (तो अपने दोनों) हाथ जोड़ के (यही) दान माँगता है (कि हे प्रभु! मुझे) अपन नाम दे।2।1।6।```

*माली गउड़ा महला ५ ॥ प्रभ समरथ देव अपार ॥ कउनु जानै चलित तेरे किछु अंतु नाही पार ॥१॥ रहाउ॥*

प्रभ = हे प्रभु! समरथ = हे सब ताकतों के मालिक! देव = हे प्रकाश रूप! अपार = हे बेअंत! जानै = जानता है। चलित = तमाशे, करिश्मे। पार = परला छोर।1। रहाउ।

```हे प्रभु! हे सब ताकतों के मालिक! हे प्रकाश रूप! हे बेअंत! तेरे करिश्मों को कोई भी नहीं जान सकता। तेरे करिश्मों का अंत नहीं पाया जा सकता, परला छोर (उस पार को) नहीं पाया जा सकता।1। रहाउ।```

*इक खिनहि थापि उथापदा घड़ि भंनि करनैहारु ॥ जेत कीन उपारजना प्रभु दानु देइ दातार ॥१॥*

खिनहि = खिन में। थापि = पैदा करके। उथापदा = नाश करता है। घड़ि = घड़ के। भंनि = तोड़ के। करनैहारु = सब कुछ कर सकने वाला। जेत उपारजना = जितनी भी सृष्टि। कीन = पैदा की है। देइ = देता है। दातार = दातें देने वाला।1।

```हे भाई! सब कुछ कर सकने वाला परमात्मा घड़ के पैदा करके (उसको) एक छिन में तोड़ के नाश कर देता है। हे भाई! जितनी भी सृष्टि उसने पैदा की है, दातें देने वाला वह प्रभु (सारी सृष्टि को) दान देता है।1।```

*हरि सरनि आइओ दासु तेरा प्रभ ऊच अगम मुरार ॥ कढि लेहु भउजल बिखम ते जनु नानकु सद बलिहार ॥२॥२॥७॥*

हरि = हे हरि! प्रभ = हे प्रभु! ऊच = हे सबसे ऊँचे! अगम = हे अगम्य (पहुँच से परे)! मुरार = हे मुरारि! भउजल बिखम ते = मुश्किल संसार समुंदर से। ते = से, में से। सद = सदा।2।

```हे हरि! हे प्रभु! हे सबसे ऊँचे! हे अगम्य (पहुँच से परे)! हे मुरारि! तेरा दास (नानक) तेरी शरण आया है। (अपने दास को) मुश्किल संसार-समुंदर में से बाहर निकाल ले। दास नानक तुझसे सदा सदके जाता है।2।2।7।```

*माली गउड़ा महला ५ ॥ मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥ दीन बांधव भगति वछल सदा सदा क्रिपाल ॥१॥ रहाउ॥*

मनि = मन में। तनि = तन में। गोपाल = सृष्टि का पालक। दीन बांधव = गरीबों का सहायक। भगति वछल = भक्ति से प्यार करने वाला।1। रहाउ।

```हे सृष्टि के पालक! गरीबों के सहायक! हे भक्ति से प्यार करने वाले! हे सदा ही कृपालु! तुम ही मेरे मन में बस रहे हो।1। रहाउ।```

*आदि अंते मधि तूहै प्रभ बिना नाही कोइ ॥ पूरि रहिआ सगल मंडल एकु सुआमी सोइ ॥१॥*

आदि = (जगत के) आरम्भ से। अंते = (जगत के) आखिर में। मधि = (जगत के) बीच में, अब भी। सगल मंडल = सारे मण्डलों में। पूरि रहिआ = भरपूर है, व्यापक है।1।

```हे प्रभु! (जगत रचना के) आरम्भ में तू ही था, (जगत के) अंत में भी तू ही होगा, अब भी तू ही है (सदा कायम रहने वाला)। हे भाई! प्रभु के बिना कोई और (सदा कायम रहने वाला) नहीं। हे भाई! एक मालिक प्रभु ही सारे भवनों में व्यापक है।1।```

*करनि हरि जसु नेत्र दरसनु रसनि हरि गुन गाउ ॥ बलिहारि जाए सदा नानकु देहु अपणा नाउ ॥२॥३॥८॥६॥१४॥*

करनि = कान से। नेत्र = आँखों से। रसनि = जीभ से। गाउ = मैं गाता हूँ। बलिहार जाए = कुर्बान जाता है।2।

```(हे भाई!) मैं कानों से हरि की सिफति-सालाह (सुनता हूँ), आँखों से हरि के दर्शन (करता हूँ) जीभ से हरि के गुण गाता हूँ। (हे भाई! प्रभु का दास) नानक सदा उससे कुर्बान जाता है (और उसके दर पर अरदास करता है: हे प्रभु!) मुझे अपना नाम बख्श।2।3।8।6।14।```

*माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*

धंनि = धन्य, बलिहार जाने योग्य। राम बेनु = राम (जी) की बाँसुरी। बाजै = बज रही है। मधुर = मीठी। धुनि = सुर। अनहत = एक रस। गाजै = गरज रही है, गुँजार डाल रही है।1। रहाउ।
मेघा = मेंढा। रोमावली = रोम+आवली, रोमों की कतार, ऊन। ओढै = ओढ़ता है, पहनता है।1।
जिह ग्रिहि = जिसके घर में (पैदा हुए)। रमईआ = सुंदर राम जी। कवलापती = कमला के पति, लक्ष्मी के पति, विष्णु, कृष्ण जी।2।
बनखंड = जंगल का हिस्सा, वन का खण्ड। बिंद्राबन = (सं: वृंदावन) तुलसी का जंगल।3।
बेनु = बँसरी। गोधनु = गाएं (गायों का रूप धन)। चरै = चरता है। आनदु = खुशी, करिश्मा।4।
माधउ = हे माधो! हे प्रभु! धनु = धन्य, प्रशंसा योग्य। केसौं = (सं: कैशव केशा: प्रशास्ता: सन्दि अस्य) लंबे केसों वाला प्रभु।1। रहाउ।
कर = हाथों में। धरे = धर के, ले के। ते = से। प्रान = जिंद। हसती = हाथी। अंबर लेत = कपड़े उतारते हुए। उबारीअले = (इज्जत) बचाई।1।
गोतम नारि = गौतम ऋषि की पत्नी। पावन = पवित्र किए। केतक = कई जीव। अधमु = नीच। अजाति = नीच जाति वाला। तउ = तेरी।2।
सभै घट = सारे घटों में। रामा = राम ही। रे = हे भाई! को = कौन?।1। रहाउ।
एकल माटी = एक ही मिट्टी से। कुंजर = कुंचर, हाथी। चीटी = कीड़ी। भाजन = बरतन। नाना = कई किस्मों के। रे = हे भाई! असथावरु = (वृक्ष पर्वत आदि वह पदार्थ) जो एक जगह टिके रहते हैं। जंगम = चलने फिरने हिलने जुलने वाले जीव-जंतु। कीट = कीड़े। घटि घटि = हरेक घट में।1।
एकल अनंता = एक प्रभु की। चिंता = ध्यान, तवज्जो। तजहु = छोड़ दे। निहकाम = वासना रहित। को...दासा = उस दास और उसके ठाकुर में फर्क नहीं रह जाता।2।

```मैं सदके हूँ राम जी की बाँसुरी से जो बज रही है, बड़ी मीठी सुर से एक रस गुँजार डाल रही है।1। रहाउ।```
``` सदके हूँ उस मेंढे की ऊन से, सदके हूँ उस कंबली से जो कृष्ण जी पहन रहे हैं।1।```
``` हे माँ देवकी! तुझसे (भी) कुर्बान हूँ, जिसके घर में सुंदर राम जी, कृष्ण जी (पैदा हुए)।2।```
``` धन्य है जंगल का वह भाग, वह वृंदावन, जहाँ श्री नारायण जी (कृष्ण रूप में) खेलते हैं।3।```
``` नामदेव का प्रभु (कृष्ण रूप में) बाँसुरी बजा रहा है, गाएं चरा रहा है, और (ऐसे ही और भी) रंग बना रहा है।4।1।```
``` हे मेरे माधव! हे लंबे केसों वाले प्रभु! हे साँवले रंग वाले प्रभु! हे बीठुल! तू धन्य है, तू मेरा पिता है (भाव, तू ही मुझे पैदा करने वाला और रखवाला है)।1। रहाउ।```
``` हे माधो! हाथों में चक्र पकड़ के बैकुंठ से (ही) आया था और हाथी के प्राण (तेंदूए से) तूने ही बचाए थे। हे साँवले प्रभु! दुस्शासन की सभा में जब द्रोपदी के वस्त्र उतारे जा रहे थे तब उसकी इज्जत भी तूने ही बचाई थी।```
``` हे बीठल! गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को (जो ऋषि के श्राप से शिला बन गई थी) तूने ही मुक्त किया था; हे माधव! तूने (अनेक पतितों को) पवित्र किया और उनका उद्धार कियाहै।```
```मैं नामदेव (भी) एक बहुत ही नीच हूँ और नीच जाति वाला हूँ, मैं तेरी शरण आया हूँ (मेरा भी उद्धार कर)।2।2।```
``` हे भाई! सारे घटों (शरीरों) में परमात्मा बोलता है, परमात्मा ही बोलता है, परमात्मा के बिना और कोई नहीं बोलता।1। रहाउ।```
``` हे भाई! जैसे एक ही मिट्टी से कई किस्मों के बर्तन बनाए जाते हैं, वैसे ही हाथी से ले के कीड़ी तक, निर्जीव और सजीव जीव, कीड़े-पतंगे हरेक घट में परमात्मा ही समाया हुआ है।1।```
``` हे भाई! और सबकी आशा छोड़, एक बेअंत प्रभु का ध्यान धर (जो सबमें मौजूद है)। नामदेव विनती करता है: जो मनुष्य (प्रभु का ध्यान धर के) निष्काम हो जाता है उसमें और प्रभु में कोई भिन्न-भेद नहीं रह जाता।2।3।```

*धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥ मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै ॥१॥ रहाउ॥*

धंनि = धन्य, बलिहार जाने योग्य। राम बेनु = राम (जी) की बाँसुरी। बाजै = बज रही है। मधुर = मीठी। धुनि = सुर। अनहत = एक रस। गाजै = गरज रही है, गुँजार डाल रही है।1। रहाउ।

```मैं सदके हूँ राम जी की बाँसुरी से जो बज रही है, बड़ी मीठी सुर से एक रस गुँजार डाल रही है।1। रहाउ।```

*धनि धनि मेघा रोमावली ॥ धनि धनि क्रिसन ओढै कांबली ॥१॥*

मेघा = मेंढा। रोमावली = रोम+आवली, रोमों की कतार, ऊन। ओढै = ओढ़ता है, पहनता है।1।

```सदके हूँ उस मेंढे की ऊन से, सदके हूँ उस कंबली से जो कृष्ण जी पहन रहे हैं।1।```

*धनि धनि तू माता देवकी ॥ जिह ग्रिह रमईआ कवलापती ॥२॥*

जिह ग्रिहि = जिसके घर में (पैदा हुए)। रमईआ = सुंदर राम जी। कवलापती = कमला के पति, लक्ष्मी के पति, विष्णु, कृष्ण जी।2।

```हे माँ देवकी! तुझसे (भी) कुर्बान हूँ, जिसके घर में सुंदर राम जी, कृष्ण जी (पैदा हुए)।2।```

*धनि धनि बन खंड बिंद्राबना ॥ जह खेलै स्री नाराइना ॥३॥*

बनखंड = जंगल का हिस्सा, वन का खण्ड। बिंद्राबन = (सं: वृंदावन) तुलसी का जंगल।3।

```धन्य है जंगल का वह भाग, वह वृंदावन, जहाँ श्री नारायण जी (कृष्ण रूप में) खेलते हैं।3।```

*बेनु बजावै गोधनु चरै ॥ नामे का सुआमी आनद करै ॥४॥१॥*

बेनु = बँसरी। गोधनु = गाएं (गायों का रूप धन)। चरै = चरता है। आनदु = खुशी, करिश्मा।4।

```नामदेव का प्रभु (कृष्ण रूप में) बाँसुरी बजा रहा है, गाएं चरा रहा है, और (ऐसे ही और भी) रंग बना रहा है।4।1।```

*मेरो बापु माधउ तू धनु केसौ सांवलीओ बीठुलाइ ॥१॥ रहाउ॥*

माधउ = हे माधो! हे प्रभु! धनु = धन्य, प्रशंसा योग्य। केसौं = (सं: कैशव केशा: प्रशास्ता: सन्दि अस्य) लंबे केसों वाला प्रभु।1। रहाउ।

```हे मेरे माधव! हे लंबे केसों वाले प्रभु! हे साँवले रंग वाले प्रभु! हे बीठुल! तू धन्य है, तू मेरा पिता है (भाव, तू ही मुझे पैदा करने वाला और रखवाला है)।1। रहाउ।```

*कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले ॥ दुहसासन की सभा द्रोपती अ्मबर लेत उबारीअले ॥१॥*

कर = हाथों में। धरे = धर के, ले के। ते = से। प्रान = जिंद। हसती = हाथी। अंबर लेत = कपड़े उतारते हुए। उबारीअले = (इज्जत) बचाई।1।

```हे माधो! हाथों में चक्र पकड़ के बैकुंठ से (ही) आया था और हाथी के प्राण (तेंदूए से) तूने ही बचाए थे। हे साँवले प्रभु! दुस्शासन की सभा में जब द्रोपदी के वस्त्र उतारे जा रहे थे तब उसकी इज्जत भी तूने ही बचाई थी।```

*गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले ॥ ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले ॥२॥२॥*

गोतम नारि = गौतम ऋषि की पत्नी। पावन = पवित्र किए। केतक = कई जीव। अधमु = नीच। अजाति = नीच जाति वाला। तउ = तेरी।2।

```हे बीठल! गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को (जो ऋषि के श्राप से शिला बन गई थी) तूने ही मुक्त किया था; हे माधव! तूने (अनेक पतितों को) पवित्र किया और उनका उद्धार कियाहै।```
```मैं नामदेव (भी) एक बहुत ही नीच हूँ और नीच जाति वाला हूँ, मैं तेरी शरण आया हूँ (मेरा भी उद्धार कर)।2।2।```

*सभै घट रामु बोलै रामा बोलै ॥ राम बिना को बोलै रे ॥१॥ रहाउ॥*

सभै घट = सारे घटों में। रामा = राम ही। रे = हे भाई! को = कौन?।1। रहाउ।

```हे भाई! सारे घटों (शरीरों) में परमात्मा बोलता है, परमात्मा ही बोलता है, परमात्मा के बिना और कोई नहीं बोलता।1। रहाउ।```

*एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हैं बहु नाना रे ॥ असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥१॥*

एकल माटी = एक ही मिट्टी से। कुंजर = कुंचर, हाथी। चीटी = कीड़ी। भाजन = बरतन। नाना = कई किस्मों के। रे = हे भाई! असथावरु = (वृक्ष पर्वत आदि वह पदार्थ) जो एक जगह टिके रहते हैं। जंगम = चलने फिरने हिलने जुलने वाले जीव-जंतु। कीट = कीड़े। घटि घटि = हरेक घट में।1।

```हे भाई! जैसे एक ही मिट्टी से कई किस्मों के बर्तन बनाए जाते हैं, वैसे ही हाथी से ले के कीड़ी तक, निर्जीव और सजीव जीव, कीड़े-पतंगे हरेक घट में परमात्मा ही समाया हुआ है।1।```

*एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ॥ प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे ॥२॥३॥*

एकल अनंता = एक प्रभु की। चिंता = ध्यान, तवज्जो। तजहु = छोड़ दे। निहकाम = वासना रहित। को...दासा = उस दास और उसके ठाकुर में फर्क नहीं रह जाता।2।

```हे भाई! और सबकी आशा छोड़, एक बेअंत प्रभु का ध्यान धर (जो सबमें मौजूद है)। नामदेव विनती करता है: जो मनुष्य (प्रभु का ध्यान धर के) निष्काम हो जाता है उसमें और प्रभु में कोई भिन्न-भेद नहीं रह जाता।2।3।```