Guruvaani - 957

रामकली की वार महला ५


ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

बसीठु = बिचौला, वकील। मंत्रु = उपदेश। धुरे = धुर से, आदि से। संजोगु = मेल, मिलाप।
वादि = झगड़ा करने वाले, वैरी। बादि = व्यर्थ। साकत = ईश्वर से टूटे हुए। सादि = स्वाद में। नानकि = नानक ने। परसादि = मेहर से। बुझिआ = ज्ञान हासिल कर लिया है, सांझ डाल ली है।
थटणहारै = बनाने वाले (प्रभु) ने। थाटु = बनावट। आपे = खुद ही। थटिआ = बनाया। खटिआ = (हरि नाम के व्यापार की) कमाई की। पसारु = जग रचना का पसारा। रटिआ = रति हुआ। कीम = कीमत। अलख = जिसके सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। परै परटिआ = परे से परे। वजीरटिआ = वजीर, सलाह देने वाला। मटिआ = मट, ठिकाना। गुरमुखि = गुरु के द्वारा, गुरु के सन्मुख होने से, गुरु के बताए हुए राह पर चलने से।
मै = मुझे। हउ = मैं। तिसु = उस (गुरु) को। बाहरा = बगैर। संसारि = जगत में। मिलाइअनु = मिलाया है उस (प्रभु) ने। वरतै = रहता है। ध्रिगु = धिक्कार योग्य।
लोचा = तमन्ना, चाहत। पावा = पाऊँ, मिलूँ। प्रभ = हे प्रभु! तोहि = तुझे। लोड़ि लहु = ढूँढ दो। मोहि = मुझे। गुरि पूरै = पूरे गुरु ने। जत = जिधर। तत = उधर। सेविआ = स्मरण किया है। जेवडु = जितना, बराबर का।
कितु मुखि = कौन से मुँह से? धारि = धार के, कर के। समाहीऐ = पकड़ाता है। वसि = वश में, आसरे। इक धर = एक (प्रभु ही) आसरा। कर = हाथ (बहुवचन)। बिनोद = खेल तमाशे। सरब धार = सबको आसरा देने वाला। हउ = मैं। जो पाहि = जो (लोग) पड़ते हैं। तिनी = उन्होंने ही। रसु = आनंद। भोगिआ = आनंद लिया।
भीड़हु = भीड़ से, मुसीबत से। मोकलाई = खलासी, निजात, छुट्टी। कीतीअनु = की है उस (प्रभु) ने। कुटंबै नालि = परिवार समेत। सवारिअनु = सवारे हैं उसने। सभालि = याद रख, याद कर। कंठि = गले से। लहुड़े = छोटे, अंजान। पालि = पाल के। नदरि = मेहर की निगाह से। निहाल = देखता है।

सतिगुरु (के बारे में) जिस प्रकार का सुनते थे, वैसा ही मैंने (आँखों से) देख लिया है, गुरु प्रभु की हजूरी का बिचौला है, प्रभु से विछुड़ों को (दोबारा) प्रभु से मिला देता है, प्रभु के नाम स्मरण का उपदेश (जीव के हृदय में) दृढ़ कर देता है (और इस तरह उसका) अहंकार का रोग दूर कर देता है।
पर, हे नानक! प्रभु उनको ही गुरु से मिलाता है जिनके भाग्यों में धुर से ही ये मेल लिखा होता है।1।
अगर एक प्रभु मित्र बन जाए तो सारे जीव मित्र बन जाते हैं; पर अगर एक अकाल-पुरख वैरी हो जाए तो सारे जीव वैरी बन जाते हैं (भाव, एक प्रभु को मित्र बनाने से सारे जीव प्यारे लगते हैं, और प्रभु से विछुड़ने पर जगत के सारे जीवों से दूरी बन जाती है)। ये बात पूरे गुरु ने दिखा दी है कि नाम-स्मरण के बिना (प्रभु को सज्जन बनाए बिना) और हरेक कार्य व्यर्थ है, (क्योंकि) ईश्वर से टूटे हुए विकारी व्यक्ति जो माया के स्वाद में मस्त रहते हैं वे भटकते फिरते हैं।
दास नानक ने सतिगुरु की मेहर का सदका परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली है।2।
बनाने वाले (प्रभु) ने खुद ही ये (जगत-) रचना बनाई है। (इस जगत-हाट में) वह खुद ही पूरा शाह है, और खुद ही (अपने नाम की) कमाई कमा रहा है। प्रभु खुद ही (जगत-) पसारा पसार के खुद ही (इस पसारे के) रंगों में मिला हुआ है। उस अलख परमात्मा की रची हुई कुरदति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। प्रभु अगम्य (पहुँच से परे) है, (वह एक ऐसा समुंदर है जिसकी) गहराई मापी नहीं जा सकती, उसका अंत नहीं पाया जा सकता, वह परे से परे है।
प्रभु स्वयं ही बहुत बड़ा पातशाह है, स्वयं ही अपना सलाहकार है। कोई जीव प्रभु की प्रतिभा का मूल्य नहीं डाल सकता, कोई नहीं जानता उसका कितना बड़ा (ऊँचा) ठिकाना है। प्रभु स्वयं ही सदा स्थिर रहने वाला मालिक है। गुरु के द्वारा ही उसके बारे में समझ पड़ती है।1।
हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभु! (मेरी विनती) सुन, मुझे गुरु के दीदार करा दे; मैं गुरु को अपना मन दे दूँगा और उसको सदा अपने हृदय में संभाल के रखूँगा, (क्योंकि) एक गुरु के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है (गुरु के बताए हुए राह पर चले बिना जगत में धिक्कारना ही मिलती हैं)। हे दास नानक! उस (प्रभु) ने उन (भाग्यशालियों) को गुरु मिलाया है, जिनके साथ प्रभु स्वयं बसता है।1।
हे प्रभु! मेरे हृदय में तुझे मिलने की तमन्ना है, तुझे कैसे मिलूँ? (हे भाई!) मुझे कोई ऐसा मित्र ढूँढ दो जो मुझे प्यारे प्रभु से मिला दे। (मेरी आरजू सुन के) पूरे गुरु ने मुझे प्रभु से मिला दिया है, (अब) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही प्रभु दिखाई देता है। हे दास नानक! (कह:) मैं अब उस प्रभु को स्मरण करता हूँ, उस प्रभु के बराबर का कोई और नहीं है।2।
(सब जीवों को रिजक) देने वाले प्रभु को किसी मुँह से भी सराहा नहीं जा सकता (कोई भी जीव उसकी महिमा पूरी तरह नहीं कर सकता)। प्रभु मेहर करके जिस जीव की रक्षा करता है उसको रिजक पहुँचाता है। (दरअसल) कोई जीव किसी (और जीव) के आसरे नहीं है, सब जीवों का आसरा एक परमात्मा ही है। वह स्वयं ही (अपना) हाथ दे के बालक की तरह पालता है।
प्रभु स्वयं ही चोज-तमाशे कर रहा है, (उसके इन चोज-तमाशों की) कोई समझ नहीं पड़ सकती। मैं सदके हूँ उस प्रभु से जो सब जीवों का आसरा है और सब कुछ करने की ताकत रखता है।
रात-दिन प्रभु की स्तुति करनी चाहिए। परमात्मा ही एक ऐसी हस्ती है जिसके गुण गाने चाहिए। (पर) उन लोगों ने प्रभु (के गुण गाने) का आनंद पाया है जो सतिगुरु के चरणों में पड़ते हैं।2।
(हे मन!) उस प्रभु को सदा याद कर जो तेरे सारे काम आप सवाँरता है, जो तुझे दुखों से खलासी देता है और तेरे सारे परिवार समेत तेरी रक्षा करता है। माता-पिता की तरह अंजाने बालकों को पाल के प्रभु (जीवों को) गले से लगाता है। हे नानक! जिस मनुष्य की ओर प्रभु मेहर की निगाह से देखता है, उस पर सब जीव दयालु हो जाते हैं।1।


सलोक मः ५ ॥ जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥ विछुड़िआ मेले प्रभू हरि दरगह का बसीठु ॥ हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा कटे हउमै रोगु ॥ नानक सतिगुरु तिना मिलाइआ जिना धुरे पइआ संजोगु ॥१॥

बसीठु = बिचौला, वकील। मंत्रु = उपदेश। धुरे = धुर से, आदि से। संजोगु = मेल, मिलाप।

सतिगुरु (के बारे में) जिस प्रकार का सुनते थे, वैसा ही मैंने (आँखों से) देख लिया है, गुरु प्रभु की हजूरी का बिचौला है, प्रभु से विछुड़ों को (दोबारा) प्रभु से मिला देता है, प्रभु के नाम स्मरण का उपदेश (जीव के हृदय में) दृढ़ कर देता है (और इस तरह उसका) अहंकार का रोग दूर कर देता है।
पर, हे नानक! प्रभु उनको ही गुरु से मिलाता है जिनके भाग्यों में धुर से ही ये मेल लिखा होता है।1।


मः ५ ॥ इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥ गुरि पूरै देखालिआ विणु नावै सभ बादि ॥ साकत दुरजन भरमिआ जो लगे दूजै सादि ॥ जन नानकि हरि प्रभु बुझिआ गुर सतिगुर कै परसादि ॥२॥

वादि = झगड़ा करने वाले, वैरी। बादि = व्यर्थ। साकत = ईश्वर से टूटे हुए। सादि = स्वाद में। नानकि = नानक ने। परसादि = मेहर से। बुझिआ = ज्ञान हासिल कर लिया है, सांझ डाल ली है।

अगर एक प्रभु मित्र बन जाए तो सारे जीव मित्र बन जाते हैं; पर अगर एक अकाल-पुरख वैरी हो जाए तो सारे जीव वैरी बन जाते हैं (भाव, एक प्रभु को मित्र बनाने से सारे जीव प्यारे लगते हैं, और प्रभु से विछुड़ने पर जगत के सारे जीवों से दूरी बन जाती है)। ये बात पूरे गुरु ने दिखा दी है कि नाम-स्मरण के बिना (प्रभु को सज्जन बनाए बिना) और हरेक कार्य व्यर्थ है, (क्योंकि) ईश्वर से टूटे हुए विकारी व्यक्ति जो माया के स्वाद में मस्त रहते हैं वे भटकते फिरते हैं।
दास नानक ने सतिगुरु की मेहर का सदका परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली है।2।


पउड़ी ॥ थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥ आपे पूरा साहु आपे ही खटिआ ॥ आपे करि पासारु आपे रंग रटिआ ॥ कुदरति कीम न पाइ अलख ब्रहमटिआ ॥ अगम अथाह बेअंत परै परटिआ ॥ आपे वड पातिसाहु आपि वजीरटिआ ॥ कोइ न जाणै कीम केवडु मटिआ ॥ सचा साहिबु आपि गुरमुखि परगटिआ ॥१॥

थटणहारै = बनाने वाले (प्रभु) ने। थाटु = बनावट। आपे = खुद ही। थटिआ = बनाया। खटिआ = (हरि नाम के व्यापार की) कमाई की। पसारु = जग रचना का पसारा। रटिआ = रति हुआ। कीम = कीमत। अलख = जिसके सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। परै परटिआ = परे से परे। वजीरटिआ = वजीर, सलाह देने वाला। मटिआ = मट, ठिकाना। गुरमुखि = गुरु के द्वारा, गुरु के सन्मुख होने से, गुरु के बताए हुए राह पर चलने से।

बनाने वाले (प्रभु) ने खुद ही ये (जगत-) रचना बनाई है। (इस जगत-हाट में) वह खुद ही पूरा शाह है, और खुद ही (अपने नाम की) कमाई कमा रहा है। प्रभु खुद ही (जगत-) पसारा पसार के खुद ही (इस पसारे के) रंगों में मिला हुआ है। उस अलख परमात्मा की रची हुई कुरदति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। प्रभु अगम्य (पहुँच से परे) है, (वह एक ऐसा समुंदर है जिसकी) गहराई मापी नहीं जा सकती, उसका अंत नहीं पाया जा सकता, वह परे से परे है।
प्रभु स्वयं ही बहुत बड़ा पातशाह है, स्वयं ही अपना सलाहकार है। कोई जीव प्रभु की प्रतिभा का मूल्य नहीं डाल सकता, कोई नहीं जानता उसका कितना बड़ा (ऊँचा) ठिकाना है। प्रभु स्वयं ही सदा स्थिर रहने वाला मालिक है। गुरु के द्वारा ही उसके बारे में समझ पड़ती है।1।


सलोकु मः ५ ॥ सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥ हउ तिसु देवा मनु आपणा नित हिरदै रखा समालि ॥ इकसु सतिगुर बाहरा ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि ॥१॥

मै = मुझे। हउ = मैं। तिसु = उस (गुरु) को। बाहरा = बगैर। संसारि = जगत में। मिलाइअनु = मिलाया है उस (प्रभु) ने। वरतै = रहता है। ध्रिगु = धिक्कार योग्य।

हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभु! (मेरी विनती) सुन, मुझे गुरु के दीदार करा दे; मैं गुरु को अपना मन दे दूँगा और उसको सदा अपने हृदय में संभाल के रखूँगा, (क्योंकि) एक गुरु के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है (गुरु के बताए हुए राह पर चले बिना जगत में धिक्कारना ही मिलती हैं)। हे दास नानक! उस (प्रभु) ने उन (भाग्यशालियों) को गुरु मिलाया है, जिनके साथ प्रभु स्वयं बसता है।1।


मः ५ ॥ मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥ कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु जो मेले प्रीतमु मोहि ॥ गुरि पूरै मेलाइआ जत देखा तत सोइ ॥ जन नानक सो प्रभु सेविआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥२॥

लोचा = तमन्ना, चाहत। पावा = पाऊँ, मिलूँ। प्रभ = हे प्रभु! तोहि = तुझे। लोड़ि लहु = ढूँढ दो। मोहि = मुझे। गुरि पूरै = पूरे गुरु ने। जत = जिधर। तत = उधर। सेविआ = स्मरण किया है। जेवडु = जितना, बराबर का।

हे प्रभु! मेरे हृदय में तुझे मिलने की तमन्ना है, तुझे कैसे मिलूँ? (हे भाई!) मुझे कोई ऐसा मित्र ढूँढ दो जो मुझे प्यारे प्रभु से मिला दे। (मेरी आरजू सुन के) पूरे गुरु ने मुझे प्रभु से मिला दिया है, (अब) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही प्रभु दिखाई देता है। हे दास नानक! (कह:) मैं अब उस प्रभु को स्मरण करता हूँ, उस प्रभु के बराबर का कोई और नहीं है।2।


पउड़ी ॥ देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥ जिसु रखै किरपा धारि रिजकु समाहीऐ ॥ कोइ न किस ही वसि सभना इक धर ॥ पाले बालक वागि दे कै आपि कर ॥ करदा अनद बिनोद किछू न जाणीऐ ॥ सरब धार समरथ हउ तिसु कुरबाणीऐ ॥ गाईऐ राति दिनंतु गावण जोगिआ ॥ जो गुर की पैरी पाहि तिनी हरि रसु भोगिआ ॥२॥

कितु मुखि = कौन से मुँह से? धारि = धार के, कर के। समाहीऐ = पकड़ाता है। वसि = वश में, आसरे। इक धर = एक (प्रभु ही) आसरा। कर = हाथ (बहुवचन)। बिनोद = खेल तमाशे। सरब धार = सबको आसरा देने वाला। हउ = मैं। जो पाहि = जो (लोग) पड़ते हैं। तिनी = उन्होंने ही। रसु = आनंद। भोगिआ = आनंद लिया।

(सब जीवों को रिजक) देने वाले प्रभु को किसी मुँह से भी सराहा नहीं जा सकता (कोई भी जीव उसकी महिमा पूरी तरह नहीं कर सकता)। प्रभु मेहर करके जिस जीव की रक्षा करता है उसको रिजक पहुँचाता है। (दरअसल) कोई जीव किसी (और जीव) के आसरे नहीं है, सब जीवों का आसरा एक परमात्मा ही है। वह स्वयं ही (अपना) हाथ दे के बालक की तरह पालता है।
प्रभु स्वयं ही चोज-तमाशे कर रहा है, (उसके इन चोज-तमाशों की) कोई समझ नहीं पड़ सकती। मैं सदके हूँ उस प्रभु से जो सब जीवों का आसरा है और सब कुछ करने की ताकत रखता है।
रात-दिन प्रभु की स्तुति करनी चाहिए। परमात्मा ही एक ऐसी हस्ती है जिसके गुण गाने चाहिए। (पर) उन लोगों ने प्रभु (के गुण गाने) का आनंद पाया है जो सतिगुरु के चरणों में पड़ते हैं।2।


सलोक मः ५ ॥ भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुट्मबै नालि ॥ कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥ प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥ दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥१॥

भीड़हु = भीड़ से, मुसीबत से। मोकलाई = खलासी, निजात, छुट्टी। कीतीअनु = की है उस (प्रभु) ने। कुटंबै नालि = परिवार समेत। सवारिअनु = सवारे हैं उसने। सभालि = याद रख, याद कर। कंठि = गले से। लहुड़े = छोटे, अंजान। पालि = पाल के। नदरि = मेहर की निगाह से। निहाल = देखता है।

(हे मन!) उस प्रभु को सदा याद कर जो तेरे सारे काम आप सवाँरता है, जो तुझे दुखों से खलासी देता है और तेरे सारे परिवार समेत तेरी रक्षा करता है। माता-पिता की तरह अंजाने बालकों को पाल के प्रभु (जीवों को) गले से लगाता है। हे नानक! जिस मनुष्य की ओर प्रभु मेहर की निगाह से देखता है, उस पर सब जीव दयालु हो जाते हैं।1।