*Guruvaani - 920*

 

*जे को गुर ते वेमुखु होवै बिनु सतिगुर मुकति न पावै ॥ पावै मुकति न होर थै कोई पुछहु बिबेकीआ जाए ॥ अनेक जूनी भरमि आवै विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥ फिरि मुकति पाए लागि चरणी सतिगुरू सबदु सुणाए ॥ कहै नानकु वीचारि देखहु विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥२२॥*

वेमुख = जिसने मुँह दूसरी तरफ किया हुआ है। मुकति = विकारों से खलासी, माया के प्रभाव से मुक्ति। होरथै = किसी और जगह से। बिबेकी = परख वाला आदमी, विचारवान। जाए = जा के। भरमि आवै = भटक के आता है।

```(जहाँ माया के मोह के कारण सहम है वहाँ आत्मिक आनंद नहीं फल-फूल सकता, पर) यदि कोई मनुष्य गुरु की और से मुँह मोड़ ले (उसको आत्मिक आनंद नसीब नहीं हो सकता क्योंकि) गुरु के बिना माया के प्रभाव से निजात नहीं मिलती। बेशक, किन्हीं विचारवानों से जा के पूछ लो (और तसल्ली कर लो, ये बात पक्की है कि गुरु के बिना) किसी भी और जगह से मायावी बंधनो से खलासी नहीं मिलती। (माया के मोह में फंसा हुआ मनुष्य) अनेक जूनियों में से भटकता आता है, गुरु की शरण पड़े बिना इस मोह से निजात नहीं मिलती। आखिर, गुरु के चरण लग के ही माया के मोह से छुटकारा मिलता है। क्योंकि गुरु (सही जीवन-मार्ग का) उपदेश सुनाता है।```
```नानक कहता है: विचार के देख लो, गुरु के बिना माया के बंधनो से आजादी नहीं मिलती, (और इस मुक्ति के बिना आत्मिक आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती)।22।```

*आवहु सिख सतिगुरू के पिआरिहो गावहु सची बाणी ॥ बाणी त गावहु गुरू केरी बाणीआ सिरि बाणी ॥ जिन कउ नदरि करमु होवै हिरदै तिना समाणी ॥ पीवहु अम्रितु सदा रहहु हरि रंगि जपिहु सारिगपाणी ॥ कहै नानकु सदा गावहु एह सची बाणी ॥२३॥*

सची बाणी = परमात्मा की महिमा वाली वाणी, सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में जोड़ने वाली वाणी। सिर = सिरपर, सबसे श्रेष्ठ। नदरि = मेहर की नजर। करमु = बख्शिश। हरि रंगि = हरि के प्यार में। सारगि पाणी = धर्नुधारी प्रभु। केरी = की। अंम्रित = आत्मिक आनंद देने वाला नाम जल।

```हे सतिगुरु के प्यारे सिखो! आओ, सदा स्थिर परमात्मा में जोड़ने वाली वाणी (मिल के) गाओ। अपने गुरु की वाणी गाओ, ये वाणी और सब बाणियों से सर्वोपरि है (शिरोमणि है)। ये वाणी उन मनुष्यों के हृदय में ही टिकती है जिस पर परमात्मा की मेहर की नजर हो, बख्शिश हो।```
```(हे प्यारे गुरसिखो!) परमात्मा का नाम स्मरण करो, परमात्मा के प्यार में सदा जुड़े रहो, ये (आनंद देने वाला, आत्मिक हिलैरे देने वाला) नाम-जल पीयो।```
```नानक कहता है: (हे गुरसिखो!) परमात्मा की महिमा वाली ये वाणी सदा गाओ (इसी में आत्मिक आनंद है)।23।```

*सतिगुरू बिना होर कची है बाणी ॥ बाणी त कची सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥ कहदे कचे सुणदे कचे कचीं आखि वखाणी ॥ हरि हरि नित करहि रसना कहिआ कछू न जाणी ॥ चितु जिन का हिरि लइआ माइआ बोलनि पए रवाणी ॥ कहै नानकु सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥२४॥*

सतिगुरू बिना = गुरु आशय के उलट। कची = हलके मेल वाली, मन को छोटा करने वाली, उच्च आत्मिक आनंद को नीचे लाने वाली। कचे = वे लोग जिनका मन कमजोर है, जो माया के प्रभाव के सामने थिड़क सकते हैं। सुणदे कचे = सुनने वालों के मन भी थिड़क जाते हैं (डोल जाते हैं)। कहिआ = जो कुछ मुँह से कहते हैं। हिरि लइआ = चुरा लिया। रवाणी = जबानी जबानी, ऊपर ऊपर से। कचीं = कच्चों ने, कमजोर मन वालों ने।

```गुरु आशय के उलट वाणी (माया) की झलक के सामने थिड़का देने वाली होती है। ये बात पक्की है कि गुरु आशै के उलट जाने वाली वाणी को सुनने वालों के मन कमजोर हो जाते हैं, और जो ऐसी वाणी पढ़-पढ़ के व्याख्या करते हैं, वे भी कमजोर मन के हो जाते हैं।```
```यदि वे लोग जीभ से हरि-नाम भी बोलें तो भी जो कुछ वे बोलते हैं उससे उनकी गहरी समीपता (सांझ गुरु से परमेश्वर से) नहीं पड़ती, क्योंकि उनके मन को माया ने मोह रखा है, वे जो कुछ बोलते हैं ऊपर ऊपर से ही बोलते हैं।```
```नानक कहता है: गुरु आशै के उलट वाणी मनुष्य के मन को आत्मिक आनंद के ठिकाने से नीचे गिराती है।24।```

*गुर का सबदु रतंनु है हीरे जितु जड़ाउ ॥ सबदु रतनु जितु मंनु लागा एहु होआ समाउ ॥ सबद सेती मनु मिलिआ सचै लाइआ भाउ ॥ आपे हीरा रतनु आपे जिस नो देइ बुझाइ ॥ कहै नानकु सबदु रतनु है हीरा जितु जड़ाउ ॥२५॥*

रतंनु = रतन, अमोलक दाति। जितु = जिस (शब्द) में। हीरे = परमात्मा के गुण। जड़ाउ = जड़े हुए। मंनु = मन। एहु समाउ = एसी लीनता। सचै = सदा स्थिर प्रभु में। भाउ = प्यार। बुझाइ देइ = सूझ देता है। हीरा = परमात्मा का नाम। आपे = स्वयं ही।

```सतिगुरु का शब्द एक ऐसी अमूल्य दाति है जिसमें परमात्मा की महिमाएं भरी हुई हैं। शब्द, मानो, (ऐसा) रतन है, कि उसके द्वारा (मनुष्य का) मन (परमात्मा की याद में) टिक जाता है (परमात्मा में) एक आश्चर्यजनक लीनता बनी रहती है।```
```अगर शब्द में (मनुष्य का) मन जुड़ जाए, तो (इसकी इनायत से) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभु में (उसका) प्रेम बन जाता है। (उसके अंदर परमात्मा का) हीरा-नाम ही टिका रहता है, (परमात्मा की महिमा का) रतन-शब्द ही टिका रहता है। (पर ये दाति उसको ही मिलती है) जिसको (प्रभु आप ये) सूझ बख्शता है।```
```नानक कहता है: गुरु का शब्द, मानो, एक रतन है जिसमें प्रभु का नाम-रूप हीरा जड़ा हुआ है।25।```

*सिव सकति आपि उपाइ कै करता आपे हुकमु वरताए ॥ हुकमु वरताए आपि वेखै गुरमुखि किसै बुझाए ॥ तोड़े बंधन होवै मुकतु सबदु मंनि वसाए ॥ गुरमुखि जिस नो आपि करे सु होवै एकस सिउ लिव लाए ॥ कहै नानकु आपि करता आपे हुकमु बुझाए ॥२६॥*

सिव = (शिव) चेतन सत्ता, जीवात्मा। सकति = (शक्ति) माया। आपे = स्वयं ही। हुकमु = (ये) हुक्म (कि जीवों पर) माया का प्रभाव बना रहे। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। किसै = किसी (विरले) को। बुझाए = सूझ देता है। मुकतु = माया के प्रभाव से आजाद स्वतंत्र। मंनि = मन में। गुरमुखि = गुरु के राह पर चलने वाला।

```जीवात्मा और माया पैदा करके परमात्मा स्वयं ही (ये) हुक्म लागू करवाता है कि (माया का जोर जीवों पर पड़ा रहे) प्रभु सवयं ही ये हुक्म बनाए रखता है, स्वयं ही ये खेल (-तमाशा) देखता है (कि किस तरह जीव माया के हाथों पर नाच रहे हैं), किसी-किसी विरले को गुरु के द्वारा (इस खेल की) सूझ देता है। (जिसको समझ बख्शता है उसके) माया (के मोह) के बंधन तोड़ देता है, वह सख्श माया के बंधनो से स्वतंत्र हो जाता है (क्योंकि) गुरु का शब्द अपने मन में बसा लेता है। गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलने योग्य वही मनुष्य होता है जिसको प्रभु ये समर्थता देता है, वह मनुष्य एक परमात्मा के चरणों में तवज्जो जोड़ता है (उसके अंदर आत्मिक आनंद बनता है, और वह माया के मोह में से निकलता है)।```
```नानक कहता है: परमात्मा खुद ही (जीवात्मा और माया की) रचना करता है और खुद ही (किसी विरले को यह) सूझ बख्शता है (कि माया का प्रभाव भी उसका अपना ही) हुक्म (जगत में बरत रहा) है।26।```

*सिम्रिति सासत्र पुंन पाप बीचारदे ततै सार न जाणी ॥ ततै सार न जाणी गुरू बाझहु ततै सार न जाणी ॥ तिही गुणी संसारु भ्रमि सुता सुतिआ रैणि विहाणी ॥ गुर किरपा ते से जन जागे जिना हरि मनि वसिआ बोलहि अम्रित बाणी ॥ कहै नानकु सो ततु पाए जिस नो अनदिनु हरि लिव लागै जागत रैणि विहाणी ॥२७॥*

ततै सार = तत्व की सूझ, अस्लियत की समझ, जो असल ग्रहण योग्य वस्तु है उसकी समझ, आत्मिक आनंद की समझ। तिही गुणी = माया के तीन स्वभावों में। भ्रमि = भटक भटक के। रैणि = उम्र, रात। से = वह लोग। मनि = मन में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त अंम्रित वाणी = आत्मिक जीवन देने वाली वाणी। जगत = विकारों की तरफ से सचेत रहते हुए।

```स्मृतियाँ व शास्त्र आदि पढ़ने वाले पण्डित सिर्फ यही विचारें करते हैं कि (इन पुस्तकों के अनुसार) पाप क्या है और पुण्य क्या है, उनको आत्मिक आनंद का रस नहीं आ सकता। (ये बात यकीनी जानिए कि) सतिगुरु की शरण आए बिना आत्मिक आनंद का रस नहीं आ सकता, जगत तीन गुणों में ही भटक-भटक के गाफिल हुआ पड़ा है, माया के मोह में सोए हुए की ही सारी उम्र गुजर जाती है (स्मृतियों-शास्त्रों की विचारें इस नींद में से जगा नहीं सकतीं)।```
```(मोह की नींद में से) गुरु की कृपा से (सिर्फ) वे मनुष्य जागते हैं जिनके अंदर परमात्मा का नाम बसता है जो परमात्मा की महिमा की वाणी उचारते हैं।```
```नानक कहता है: वही मनुष्य आत्मिक आनंद भोगता है जो हर वक्त प्रभु की याद की लगन में टिका रहता है, और जिसकी उम्र (इस तरह मोह की नींद में से) जागते हुए बीतती है।27।```

*माता के उदर महि प्रतिपाल करे सो किउ मनहु विसारीऐ ॥ मनहु किउ विसारीऐ एवडु दाता जि अगनि महि आहारु पहुचावए ॥ ओस नो किहु पोहि न सकी जिस नउ आपणी लिव लावए ॥ आपणी लिव आपे लाए गुरमुखि सदा समालीऐ ॥ कहै नानकु एवडु दाता सो किउ मनहु विसारीऐ ॥२८॥*

उदर = पेट। मनहु = मन से। किउ विसारीऐ = बिसारना नहीं चाहिए। एवडु = इतना बड़ा। अगनि = आग। आहारु = खुराक। ओस ने = उस व्यक्ति ने। किहु = कुछ। लिव = प्रीत, लगन। गुरमुखि = गुरु से। समालीऐ = स्मरणा चाहिए, हृदय में बसाना चाहिए।

```(अगर आत्मिक आनंद प्राप्त करना है तो) उस परमात्मा को कभी भुलाना नहीं चाहिए, जो माँ के पेट में (भी) पालना करता है, इतने बड़े दाते को मन से भुलाना नहीं चाहिए जो (माँ के पेट की) आग में (भी) खुराक पहुँचाता है।```
```(ये मोह ही है जो आनंद से तोड़ के रखता है, पर) उस व्यक्ति को (मोह आदिक) कुछ भी छू नहीं सकता जिसको प्रभु अपने चरणों की प्रीति बख्शता है। (पर, जीव के भी क्या वश?) प्रभु स्वयं ही अपनी प्रीति की दाति बख्शता है। (हे भाई!) गुरु की शरण पड़ कर उसको स्मरण करते रहना चाहिए।```
```नानक कहता है: (अगर आत्मिक आनंद की आवश्यक्ता है तो) इतने बड़े दातार प्रभु को कभी भुलाना नहीं चाहिए।28।```