Guruvaani - 917
रामकली महला ३ अनंदु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अनंदु = परी तरह खिलना। पाइआ = प्राप्त कर लिया। सहज = आत्मिक अडोल अवस्था। सहज सेती = अडोल अवस्था से। मनि = मन में। वाधाई = चढ़दीकला, उत्साह पैदा करने वाला गीत। परीआ = रागों की परीयाँ, रागनियाँ। राग रतन = सुंदर राग। केरा = का।
मंन मेरे = हे मेरे मन! सभि = सारे। विसारणा = दूर करने वाला। अंगीकारु = पक्ष, सहायता। समरथु = करने योग्य। मनहु = मन से। विसरे = बिसरता है।
घरि तेरै = तेरे घर में। त = तो सभु किछु = हरेक चीज। देहि = तू देता है। सु = वह मनुष्य। पावए = पा लेता है, हासिल करता है। सिफति सालाह = महिमा, बड़ाई। मनि = मन में। वसावए = बसाता है। जिन कै मनि = जिस के मन में। वाजे = बजते हैं। सबद = साजों की आवाज, रागों की सुरें। घनेरे = बेअंत। सचे = सदा कायम रहने वाले!
आधारो = आसरा। जिनि = जिस (नाम) से। भुख = लालच। करि = (पैदा) पैदा करके। मनि = मन में। इछा = मन की कामना। सभि = सारियां। कुरबाणु = सदके। विटहु = से।
वाजे = बजते हैं। पंच सबद = पाँच किस्मों के साजों की मिश्रित सुरें। तितु = उस में। तितु घरि = उस हृदय घर में। तितु सभागै घरि = उस भाग्यशाली हृदय घर में। कला = क्षमता। जितु घरि = जिस घर में। धारीआ = तूने डाली है। पंच दूत = कामादिक पाँच वैरी। कंटकु = काँटा। कंटकु कालु = डरावना काल, मौत का डर। धुरि = धुर से। करमि = मेहर से। सि = वह लोग। नामि = नाम में। अनहद = बिना बजाए बजने वाले, एकरस, लगातार।
साची लिव = सच्ची लगन, सदा कायम रहने वाली लगन, सदा स्थिर प्रभु से प्रीत। देह = शरीर। निमाणी = निआसरी सी। किआ करे = क्या करती है? जो कुछ करती है नकारे काम करती है। बनवारी = हे जगत वाड़ी के मालिक! सवारीआ = सही तरफ लगाई जा सकती हैं। वेचारीआ = पराधीन, निमाणी सी, माया के प्रभाव से।
सभु को = हरेक जीव। पिआरिआ = हे प्यारे भाई! क्रिपा करे = जब गुरु कृपा करता है। किलविख = पाप। अंजनु = सुरमा। सारिआ = (आँखों में) डालता है। अंदरहु = मन में से। सचै = सदा स्थिर (परमात्मा) ने। सबदु = बोल। सबदु सवारिआ = बोल सवार दिए (भाव, कड़वे बोल निंदा आदि के बोल नहीं बोलता)। एहु अनंदु है = असल आत्मिक आनंद ये है (कि मनुष्य का कड़वा और निंदा आदि वाला स्वभाव ही नहीं रहता)।
हे भाई माँ! (मेरे अंदर) पूर्ण खिड़ाव (आनंद) पैदा हो गया है (क्योंकि) मुझे गुरु मिल गया है। मुझे गुरु मिला है, और साथ ही अडोल अवस्था भी प्राप्त हो गई है (भाव, गुरु के मिलने से मेरा मन डोलने से हट गया है); मेरे मन में (मानो) खुशी के बाजे बज उठे हें, सुंदर राग अपने परिवार और रागनियों सहित (मेरे मन में, जैसे) प्रभु की महिमा के गीत गाने आ गए हैं।
(हे भाई! तुम भी) प्रभु की महिमा के गीत गाओ। जिस-जिस ने महिमा के शब्द मन में बसाए हैं (उनके अंदर सम्पूर्ण आनंद पैदा हो जाता है)।
नानक कहता है (मेरे अंदर भी) आनंद बन गया है (क्योंकि) मुझे सतिगुरु मिल गया है।1।
हे मेरे मन! तू सदा प्रभु के साथ जुड़ा रह। हे मेरे मन! तू सदा प्रभु को याद रख। वह प्रभु सारे दुख दूर करने वाला है। वह सदा तेरी सहायता करने वाला है तेरे सारे काम सफल करने के समर्थ है।
(हे भाई!) उस मालिक को क्यों (अपने) मन से भुलाता है जो सारे काम करने योग्य है?
नानक कहता है: हे मेरे मन! तू सदा प्रभु के चरणों में जुड़ा रह।2।
हे सदा कायम रहने वाले मालिक (-प्रभु)! (मैं तेरे दर से मन का आनंद माँगता हूं, पर) तेरे घर में कौन सी चीज नहीं है? तेरे घर में तो हरेक चीज मौजूद है, वही मनुष्य प्राप्त करता है जिसको तू स्वयं देता है (फिर, वह मनुष्य) तेरा नाम और तेरी महिमा (अपने) मन में बसाता है (जिसकी इनायत से उसके अंदर आनंद पैदा हो जाता है)। जिस लोगों के मन में (तेरा) नाम बसता है (उनके अंदर, मानो) बेअंत साजों की (मिली जुलीं) सुरें बजने लग पड़ती हैं (भाव, उनके मन में वह खुशी का चाव पैदा होता है जो कई साजों का मिश्रित राग सुन के पैदा होता है)।
नानक कहता है: हे सदा कायम रहने वाले मालिक! तेरे घर में किसी चीज की कमी नहीं है (और, मैं तेरे दर से आनंद का दान माँगता हूँ)।3।
(प्रभु की मेहर से उसका) सदा-स्थिर रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा (बन गया) है।
जिस (हरि-नाम) ने मेरे सारे लालच दूर कर दिए हैं, जिस (हरि-नाम) ने मेरे मन की सारी कामनाएं पूरी कर दी हैं, जो हरि-नाम (मेरे अंदर) शांति और सुख पैदा करके मेरे मन में आ टिका है, वह सदा कायम रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा बन गया है।
मैं (अपने आप को) अपने गुरु से सदके करता हूँ, क्योंकि ये सारी बरकतें गुरु की ही हैं।
नानक कहता है: हे संत जनो! (गुरु का शब्द) सुनो, गुरु के शब्द में प्यार बनाओ। (सतिगुरु की मेहर से ही प्रभु का) सदा कायम रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा (बन गया) है।4।
जिस (हृदय-) घर में (हे प्रभु! तूने) सत्ता डाली है, उस भाग्यशाली (हृदय-) घर में (मानो) पाँच किस्मों के साजों की मिश्रित सुरें बज पड़ती हैं (भाव, उस हृदय में पूर्ण आनंद बन जाता है), (हे प्रभु!) उसके पाँचों कामादिक वैरी तू काबू कर देता है, और डराने वाला काल (भाव, मौत का डर) दूर कर देता है। पर, सिर्फ वही मनुष्य हरि-नाम में जुड़ते हैं जिनके भाग्यों में तूने धुर से ही अपनी मेहर से (स्मरण के लेख लिख के) रख दिए हैं।
नानक कहता है: उस हृदय-घर में सुख पैदा होता है, उस हृदय में (मानो) एकरस (बाजे) बजते हैं।5।
सदा-स्थिर प्रभु के चरणों की लगन (के आनंद) के बिना ये (मनुष्य) शरीर निआसरा सा ही रहता है। प्रभु-चरणों की प्रीति के बिना निआसरा होया हुआ ये शरीर जो कुछ भी करता है नकारे काम ही करता है।
हे जगत के मालिक! तेरे बिना और कोई जगह नहीं जहाँ ये शरीर सही तरफ लग सके, कोई और इस को सही दिशा में लगाने के लायक ही नहीं। तू ही कृपा कर, ता कि ये गुरु के शब्द में लग के सुधर जाए।
नानक कहता है: प्रभु-चरणों की प्रीति के बिना पराधीन (भाव, माया के प्रभाव तले) है और जो कुछ करता है निकम्मे काम ही करता है।6।
कहने को तो हर कोई कह देता है कि मुझे आनंद प्राप्त हो गया है, पर (असल) आनंद की सूझ गुरु से ही मिलती है।
हे प्यारे भाई! (असल) आनंद की सूझ सदा गुरु से ही मिलती है। (वह मनुष्य असल आनंद पाता है, जिस पर गुरु) कृपा करता है। गुरु मेहर करके (उसके) (अंदर से) पाप काट देता है, और (उसकी विचार वाली आँखों में) आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा डालता है।
जिस मनुष्यों के मन में से माया का मोह समाप्त हो जाता है, अकाल-पुरख उनके बोल ही अच्छे और मीठे कर देता है।
नानक कहता है: असल आनंद ही यही है, और यह आनंद गुरु से ही समझा जा सकता है।7।
अनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मै पाइआ ॥ सतिगुरु त पाइआ सहज सेती मनि वजीआ वाधाईआ ॥ राग रतन परवार परीआ सबद गावण आईआ ॥ सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसाइआ ॥ कहै नानकु अनंदु होआ सतिगुरू मै पाइआ ॥१॥
अनंदु = परी तरह खिलना। पाइआ = प्राप्त कर लिया। सहज = आत्मिक अडोल अवस्था। सहज सेती = अडोल अवस्था से। मनि = मन में। वाधाई = चढ़दीकला, उत्साह पैदा करने वाला गीत। परीआ = रागों की परीयाँ, रागनियाँ। राग रतन = सुंदर राग। केरा = का।
हे भाई माँ! (मेरे अंदर) पूर्ण खिड़ाव (आनंद) पैदा हो गया है (क्योंकि) मुझे गुरु मिल गया है। मुझे गुरु मिला है, और साथ ही अडोल अवस्था भी प्राप्त हो गई है (भाव, गुरु के मिलने से मेरा मन डोलने से हट गया है); मेरे मन में (मानो) खुशी के बाजे बज उठे हें, सुंदर राग अपने परिवार और रागनियों सहित (मेरे मन में, जैसे) प्रभु की महिमा के गीत गाने आ गए हैं।
(हे भाई! तुम भी) प्रभु की महिमा के गीत गाओ। जिस-जिस ने महिमा के शब्द मन में बसाए हैं (उनके अंदर सम्पूर्ण आनंद पैदा हो जाता है)।
नानक कहता है (मेरे अंदर भी) आनंद बन गया है (क्योंकि) मुझे सतिगुरु मिल गया है।1।
ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मंन मेरे दूख सभि विसारणा ॥ अंगीकारु ओहु करे तेरा कारज सभि सवारणा ॥ सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे ॥ कहै नानकु मंन मेरे सदा रहु हरि नाले ॥२॥
मंन मेरे = हे मेरे मन! सभि = सारे। विसारणा = दूर करने वाला। अंगीकारु = पक्ष, सहायता। समरथु = करने योग्य। मनहु = मन से। विसरे = बिसरता है।
हे मेरे मन! तू सदा प्रभु के साथ जुड़ा रह। हे मेरे मन! तू सदा प्रभु को याद रख। वह प्रभु सारे दुख दूर करने वाला है। वह सदा तेरी सहायता करने वाला है तेरे सारे काम सफल करने के समर्थ है।
(हे भाई!) उस मालिक को क्यों (अपने) मन से भुलाता है जो सारे काम करने योग्य है?
नानक कहता है: हे मेरे मन! तू सदा प्रभु के चरणों में जुड़ा रह।2।
साचे साहिबा किआ नाही घरि तेरै ॥ घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावए ॥ सदा सिफति सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥ नामु जिन कै मनि वसिआ वाजे सबद घनेरे ॥ कहै नानकु सचे साहिब किआ नाही घरि तेरै ॥३॥
घरि तेरै = तेरे घर में। त = तो सभु किछु = हरेक चीज। देहि = तू देता है। सु = वह मनुष्य। पावए = पा लेता है, हासिल करता है। सिफति सालाह = महिमा, बड़ाई। मनि = मन में। वसावए = बसाता है। जिन कै मनि = जिस के मन में। वाजे = बजते हैं। सबद = साजों की आवाज, रागों की सुरें। घनेरे = बेअंत। सचे = सदा कायम रहने वाले!
हे सदा कायम रहने वाले मालिक (-प्रभु)! (मैं तेरे दर से मन का आनंद माँगता हूं, पर) तेरे घर में कौन सी चीज नहीं है? तेरे घर में तो हरेक चीज मौजूद है, वही मनुष्य प्राप्त करता है जिसको तू स्वयं देता है (फिर, वह मनुष्य) तेरा नाम और तेरी महिमा (अपने) मन में बसाता है (जिसकी इनायत से उसके अंदर आनंद पैदा हो जाता है)। जिस लोगों के मन में (तेरा) नाम बसता है (उनके अंदर, मानो) बेअंत साजों की (मिली जुलीं) सुरें बजने लग पड़ती हैं (भाव, उनके मन में वह खुशी का चाव पैदा होता है जो कई साजों का मिश्रित राग सुन के पैदा होता है)।
नानक कहता है: हे सदा कायम रहने वाले मालिक! तेरे घर में किसी चीज की कमी नहीं है (और, मैं तेरे दर से आनंद का दान माँगता हूँ)।3।
साचा नामु मेरा आधारो ॥ साचु नामु अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाईआ ॥ करि सांति सुख मनि आइ वसिआ जिनि इछा सभि पुजाईआ ॥ सदा कुरबाणु कीता गुरू विटहु जिस दीआ एहि वडिआईआ ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि धरहु पिआरो ॥ साचा नामु मेरा आधारो ॥४॥
आधारो = आसरा। जिनि = जिस (नाम) से। भुख = लालच। करि = (पैदा) पैदा करके। मनि = मन में। इछा = मन की कामना। सभि = सारियां। कुरबाणु = सदके। विटहु = से।
(प्रभु की मेहर से उसका) सदा-स्थिर रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा (बन गया) है।
जिस (हरि-नाम) ने मेरे सारे लालच दूर कर दिए हैं, जिस (हरि-नाम) ने मेरे मन की सारी कामनाएं पूरी कर दी हैं, जो हरि-नाम (मेरे अंदर) शांति और सुख पैदा करके मेरे मन में आ टिका है, वह सदा कायम रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा बन गया है।
मैं (अपने आप को) अपने गुरु से सदके करता हूँ, क्योंकि ये सारी बरकतें गुरु की ही हैं।
नानक कहता है: हे संत जनो! (गुरु का शब्द) सुनो, गुरु के शब्द में प्यार बनाओ। (सतिगुरु की मेहर से ही प्रभु का) सदा कायम रहने वाला नाम मेरी जिंदगी का आसरा (बन गया) है।4।
वाजे पंच सबद तितु घरि सभागै ॥ घरि सभागै सबद वाजे कला जितु घरि धारीआ ॥ पंच दूत तुधु वसि कीते कालु कंटकु मारिआ ॥ धुरि करमि पाइआ तुधु जिन कउ सि नामि हरि कै लागे ॥ कहै नानकु तह सुखु होआ तितु घरि अनहद वाजे ॥५॥
वाजे = बजते हैं। पंच सबद = पाँच किस्मों के साजों की मिश्रित सुरें। तितु = उस में। तितु घरि = उस हृदय घर में। तितु सभागै घरि = उस भाग्यशाली हृदय घर में। कला = क्षमता। जितु घरि = जिस घर में। धारीआ = तूने डाली है। पंच दूत = कामादिक पाँच वैरी। कंटकु = काँटा। कंटकु कालु = डरावना काल, मौत का डर। धुरि = धुर से। करमि = मेहर से। सि = वह लोग। नामि = नाम में। अनहद = बिना बजाए बजने वाले, एकरस, लगातार।
जिस (हृदय-) घर में (हे प्रभु! तूने) सत्ता डाली है, उस भाग्यशाली (हृदय-) घर में (मानो) पाँच किस्मों के साजों की मिश्रित सुरें बज पड़ती हैं (भाव, उस हृदय में पूर्ण आनंद बन जाता है), (हे प्रभु!) उसके पाँचों कामादिक वैरी तू काबू कर देता है, और डराने वाला काल (भाव, मौत का डर) दूर कर देता है। पर, सिर्फ वही मनुष्य हरि-नाम में जुड़ते हैं जिनके भाग्यों में तूने धुर से ही अपनी मेहर से (स्मरण के लेख लिख के) रख दिए हैं।
नानक कहता है: उस हृदय-घर में सुख पैदा होता है, उस हृदय में (मानो) एकरस (बाजे) बजते हैं।5।
साची लिवै बिनु देह निमाणी ॥ देह निमाणी लिवै बाझहु किआ करे वेचारीआ ॥ तुधु बाझु समरथ कोइ नाही क्रिपा करि बनवारीआ ॥ एस नउ होरु थाउ नाही सबदि लागि सवारीआ ॥ कहै नानकु लिवै बाझहु किआ करे वेचारीआ ॥६॥
साची लिव = सच्ची लगन, सदा कायम रहने वाली लगन, सदा स्थिर प्रभु से प्रीत। देह = शरीर। निमाणी = निआसरी सी। किआ करे = क्या करती है? जो कुछ करती है नकारे काम करती है। बनवारी = हे जगत वाड़ी के मालिक! सवारीआ = सही तरफ लगाई जा सकती हैं। वेचारीआ = पराधीन, निमाणी सी, माया के प्रभाव से।
सदा-स्थिर प्रभु के चरणों की लगन (के आनंद) के बिना ये (मनुष्य) शरीर निआसरा सा ही रहता है। प्रभु-चरणों की प्रीति के बिना निआसरा होया हुआ ये शरीर जो कुछ भी करता है नकारे काम ही करता है।
हे जगत के मालिक! तेरे बिना और कोई जगह नहीं जहाँ ये शरीर सही तरफ लग सके, कोई और इस को सही दिशा में लगाने के लायक ही नहीं। तू ही कृपा कर, ता कि ये गुरु के शब्द में लग के सुधर जाए।
नानक कहता है: प्रभु-चरणों की प्रीति के बिना पराधीन (भाव, माया के प्रभाव तले) है और जो कुछ करता है निकम्मे काम ही करता है।6।
आनंदु आनंदु सभु को कहै आनंदु गुरू ते जाणिआ ॥ जाणिआ आनंदु सदा गुर ते क्रिपा करे पिआरिआ ॥ करि किरपा किलविख कटे गिआन अंजनु सारिआ ॥ अंदरहु जिन का मोहु तुटा तिन का सबदु सचै सवारिआ ॥ कहै नानकु एहु अनंदु है आनंदु गुर ते जाणिआ ॥७॥
सभु को = हरेक जीव। पिआरिआ = हे प्यारे भाई! क्रिपा करे = जब गुरु कृपा करता है। किलविख = पाप। अंजनु = सुरमा। सारिआ = (आँखों में) डालता है। अंदरहु = मन में से। सचै = सदा स्थिर (परमात्मा) ने। सबदु = बोल। सबदु सवारिआ = बोल सवार दिए (भाव, कड़वे बोल निंदा आदि के बोल नहीं बोलता)। एहु अनंदु है = असल आत्मिक आनंद ये है (कि मनुष्य का कड़वा और निंदा आदि वाला स्वभाव ही नहीं रहता)।
कहने को तो हर कोई कह देता है कि मुझे आनंद प्राप्त हो गया है, पर (असल) आनंद की सूझ गुरु से ही मिलती है।
हे प्यारे भाई! (असल) आनंद की सूझ सदा गुरु से ही मिलती है। (वह मनुष्य असल आनंद पाता है, जिस पर गुरु) कृपा करता है। गुरु मेहर करके (उसके) (अंदर से) पाप काट देता है, और (उसकी विचार वाली आँखों में) आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा डालता है।
जिस मनुष्यों के मन में से माया का मोह समाप्त हो जाता है, अकाल-पुरख उनके बोल ही अच्छे और मीठे कर देता है।
नानक कहता है: असल आनंद ही यही है, और यह आनंद गुरु से ही समझा जा सकता है।7।